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बुधवार, 30 जनवरी 2013

मुझे कॉंग्रेस पसंद है पर मैं हिन्दू भी हूँ!

 


 मुझे  कॉंग्रेस पसंद है पर मैं हिन्दू भी हूँ!


किसी ने टिप्पणी की -''पिछली कुछ प्रस्तुतियों से सर्वथा भिन्न प्रस्तुति देख कर कुछ आश्चर्य लगा ,आपके कई आलेख कांग्रेस के और राहुल गाँधी की प्रशंसा में समर्पित थे और अब ! खैर रचना अच्छी लगी'' कोई विचित्र टिप्पणी  तो नहीं है ये .मैं इस विचित्रता  में ही आनंद का अनुभव करती हूँ .शायद सारे हिंदुस्तानी भीइसी  विचित्रता  में आनंद का अनुभव करते  हैं  अन्यथा  आज़ादी के बाद से लोकतंत्र  के मंदिर में चुनकर जाने वाले हमारे प्रतिनधि एक ही पार्टी के होते .मैं पूर्ण  प्रभुत्तासम्पन्न भारतीय गणतंत्र की नागरिक हूँ .मैं देश को स्थिर सरकार  देने वाली  कॉंग्रेस  पार्टी की प्रशंसा  भी लिखती  हूँ तो भाजपा में नरेन्द्र मोदी की तुलना  में सुषमा जी को  प्रधानमंत्री  बनाने  के पक्ष  में भी लिखती  हूँ .श्री राहुल गाँधी की प्रशंसा का मतलब यह नहीं कि मेरी कलम में कॉंग्रेस पार्टी ने स्याही भरवा दी है .देश को विकास के पथ पर ले जाने के लिए उत्सुक हर नेता मेरी पसंद है और देश को धर्म के नाम पर बांटने की कोशिश करने वाला हर नेता नापसंद .कांग्रेस ने भी जब भगवा आतंकवाद के नाम पर हिन्दुओं का अपमान किया तब मैंने अपने स्तर से इसका  विरोध किया है .सभी पार्टियों को हमने देश की सत्ता व् विपक्ष में इसलिए बैठाया है कि वे देश हित को सर्वोपरि रखकर नीतियों का निर्धारण करे .वे जन सेवक हैं और हम स्वामी .हमको अधिकार है उनको टोकने का -पुचकारने का .हम  तो आम जनता हैं जो  जिस पार्टी को देश हित में कार्य करने को तत्पर देखते हैं उसे ही वोट देकर विजयी बना देते हैं .वो चाहे कौंग्रेस हो ,भाजपा हो अथवा अन्य कोई दल .हम  ही  हैं जो किसी भी पार्टी को  गलत  राजनीती  करते  देखकर  उसे  आइना  दिखा  देते  हैं क्योंकि  -


 मुझे  कॉंग्रेस पसंद है
पर मैं हिन्दू भी हूँ!

मैं हिन्दू हूँ
लेकिन भाजपाई या स्वयं सेवक नहीं!

 मुझे गर्व है अपने धर्म पर
लेकिन गैर-धर्मियों से नफरत नहीं !

मैं रखती हूँ आस्था निज ध्रम में ,
लेकिन करती अन्य धर्मों का अपमान नहीं !

मेरी  कामना फहरती  रहे पताका मेरे धर्म की ,
लेकिन मिटाकर अस्तित्व अन्य धर्मों का नहीं !


 मैं सजग हूँ अपने धर्म के सम्मान के प्रति ,
लेकिन करती कोई दुष्प्रचार नहीं !

मैं हिन्दू हूँ
लेकिन मैं भारतीय भी हूँ !


मैं सजग नागरिक हूँ
समझ पाए आप ये बात नहीं !


                 शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 27 जनवरी 2013

नहीं झुका था भगवा तब भी नहीं झुकेगा आज !


हिन्दू प्राण बसे  भगवा में

Hindu : Rusty flag pole with saffron coloured flag a symbolic emblem of a Hindu Temple




भगवा से है जुडी आस्था ; श्रद्धा और विश्वास ,
हिन्दू प्राण बसे  भगवा में ; ये आती जाती श्वास  !



भगवाधारी   संतों ने ज्ञान प्रकाश फैलाया ,
सत्य,अहिंसा ,मानवता का  पावन  पाठ पढाया ,
भगवा रंग में रंग  हुआ है भारत का इतिहास !

 हिन्दू प्राण बसे  भगवा में ; ये आती जाती श्वास  !



आये  लुटेरे  देश  में  घुसकर ; भगवा ने उनको झेला ,
मंदिर तोड़े ,शास्त्र जलाये ,खूनी खेल था खेला ,
नहीं झुका था भगवा  तब भी नहीं झुकेगा आज !

 हिन्दू प्राण बसे  भगवा में ; ये आती जाती श्वास  !



 भगवा संग आतंक जोड़कर क्यों हमको भड़काते ?
भगवाधारी शांति दूत बन देश का मान बढ़ाते ,
भगवा बिन नहीं संभव है भारत का कभी विकास !

 हिन्दू प्राण बसे  भगवा में ; ये आती जाती श्वास  !

                                                      जय हिन्द ! जय हिन्दू  !
                                    शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

श्री राम ने क्यों लिया एक पत्नी व्रत ?-एक विवेचन

 श्री राम ने क्यों लिया एक पत्नी व्रत ?-एक विवेचन 
 Bhagwan shri ram wallpapers

मर्यादा पुरुषोतम  श्री राम का जीवन चरित युगों-युगों से सम्पूर्ण मानव-जाति  के लिए अनुकरणीय रहा है .श्री राम के चरित का हर पक्ष उज्ज्वल है .एक पुत्र ,पति ,भ्राता  और राजा  को किन जीवन मूल्यों , आदर्शो , व् मर्यादाओं का पालन जीवन-पर्यंत करना चाहिए -वह श्री राम के चरित का विश्लेषण कर भारतीय मनीषी सदैव से जन सामान्य के समक्ष प्रस्तुत करते रहे हैं .श्री राम के चरित का जो सबसे उज्ज्वल पक्ष है वो है -नारी जाति के सम्मान को पुनर्स्थापित करना . इस सन्दर्भ में  ''देवी अहिल्ला का उद्धार '' प्रसंग से भी अधिक महत्वपूर्ण  है श्री राम द्वारा आजीवन  ''एक पत्नी-व्रत '' का कठोरता से पालन .श्री राम ने जिस युग में इस व्रत का कठोरता से पालन किया उस युग में इसकी कल्पना भी अन्य किसी पुरुष से नहीं की जा सकती थी .बहुपत्नी-विवाह शासक वर्ग ,धनी एवं अभिजात वर्ग के पुरुषों के लिए प्रतिष्ठा का विषय था .संपत्ति के अंतर्गत उस काल में मात्र धन , भूमि , सेना ही नहीं आती थी स्त्री भी सम्मिलित थी .युद्ध विजयी राजा को पराजित राजा विवश होकर अपनी स्त्रियाँ भी समर्पित कर देता था अथवा वे बलात छीन   ली जाती थी  .यह विजयी राजा के ऐश्वर्य व् प्रतिष्ठा में  चार-चाँद  जड़ने जैसा था .ऐसे युग में श्री राम जब एक पत्नी व्रत लेते हैं तब उसके कारणों पर चिंतन-मनन करना आवश्यक हो जाता है जबकि स्वयं उनके धर्मचारी व् वैभवशाली पिता राजा दशरथ के तीन महारानियों -माता कौशल्या , माता कैकयी ,माता सुमित्रा  के अतिरिक्त साढ़े तीन सौ रानियाँ थी . इस सन्दर्भ में यह दृष्टव्य है -
''एतावद्नीतार्थ्मुक्त्वा ................कृतांजलि:''
[अर्थात -माता से इस प्रकार अपना  अभिप्राय बताकर श्री राम ने अपनी अन्य साढ़े तीन सौ माताओं की ओर दृष्टिपात किया और उनको भी कौशल्या की ही भांति शोकाकुल पाया .''अयोध्या कांड -एकोन चत्वारिंश:सर्ग:, श्लोक -३६-३७ '' ]
                                    श्री राम के एक पत्नी व्रत लेने के सम्बन्ध में जो सामान्य रूप से व् बहुमान्य कारण प्रत्यक्ष दिखाई देता है वह है -नारी के मानवी  अस्तित्व को मान्यता प्रदान करना .उसे संपत्ति से एक गरिमामयी मानवी रूप में स्थापित करना क्योंकि श्री राम जन्म के कारणों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण -''रावण द्वारा स्त्रियों पर किये जाने वाले अत्याचार ''; था .यथा-
''उत्साद्यती लोकंस्त्रीन........मनुषेभ्य:परंतप '' [बाल कांड -षोडश:सर्ग:, श्लोक-७ पृष्ठ -६७ ]
[ शत्रुओं को संताप देने देव ! वह रावण तीनों लोकों को पीड़ा देता और स्त्रियों का भी अपहरण कर लेता है , अब उसका वध मनुष्य के हाथ से ही निश्चित हुआ है ]

                          यह कारण जगत-विदित है किन्तु श्री राम चरित का गहराई से विश्लेषण करें तो यह ''एक पत्नी व्रत '' का मुख्य कारण नहीं ठहरता  क्योंकि यदि एक समय पर एक भार्या को सम्मान देना श्री राम के मर्यादित जीवन का आदर्श  मात्र  होता  तो भगवती  सीता  के वैकुंठ गमन के पश्चात् वे किसी अन्य श्रेष्ठ कुल की राजकुमारी को सिंहासन पर अपने वाम भाग की अधिकारिणी के रूप में प्रतिष्ठित कर सकते थे . यहाँ श्री राम के अलौकिक रूप ;जिसके अनुसार श्री नारायण की एक मात्र वाम भगिनी माता लक्ष्मी ही हैं ,को तर्क रूप में प्रस्तुत करना व्यर्थ है क्योंकि हम यहाँ मानव रूप में अवतरित राजा रामचंद्र के चरित का विश्लेषण कर रहे हैं न कि ब्रह्म स्वरुप प्रभु राम का .यज्ञ  संपन्न करने जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यो के समय भी श्री राम ने माता सीता की स्वर्णमयी प्रतिमा को ही अपने वाम भाग में प्रतिष्ठित किया .यथा -
 ''कांचनी मम पत्नी च दीक्षयाम ज्ञान्क्ष्च कर्मणि '' [उत्तर काण्ड -द्विनवतितम:सर्ग:, श्लोक-२५ ,पृष्ठ -८०१ ]
 ''न सीतायाम परम .............जानकी कांचनी भवत:''[उत्तर काण्ड -एकोंशततम:सर्ग: पृष्ठ-८१३,श्लोक-८]
 [उन्होंने (श्री राम )सीता के सिवा दूसरी किसी स्त्री से विवाह नहीं किया . प्रत्येक यज्ञ में जब धर्मपत्नी की आवश्यकता होती श्री रघुनाथ जी सीता की स्वर्णमयी प्रतिमा बनवा लिया करते थे ]

                                   एक पत्नी व्रत पर ऐसी दृढ़ता श्री राम के चरित में कैसे आई ?  इसके लिए हमें ''रामायण'' के सबसे क्रूर व् कुटिल प्रसंग पर दृष्टिपात करना होगा अर्थात रानी कैकेयी का राजा दशरथ से श्री राम के स्थान पर श्री भरत का राज्यभिषेक व् श्री राम को चौदह वर्षों का कठोर वनवास का वर मांगने का प्रसंग .इस प्रसंग में जब श्री राम वनवास हेतु माता कौशल्या से आज्ञा लेने उनके समीप जाते हैं तब श्री राम ह्रदय पर शैशव काल से लगे माता के अपमान रुपी आघातों की परतें एक एक कर उतरने लगती हैं .बालक राम की माता कौशल्या उनके पिता राजा दशरथ की ज्येष्ठ   पत्नी थी पर उन्हें राजा दशरथ की अन्य रानियों विशेषकर रानी कैकेयी के कारण जीवन भर अपमान-गरल पीना पड़ा .श्री राम को चौदह वर्षों का वनवास दिए  जाने पर माता कौशल्या का ह्रदय चीत्कार कर उठता है . तब उनके उर की व्यथा प्रकट हुए बिना नहीं रहती .वे कहती हैं -
 ''त्वयि ...मरन्येवाही ''[श्लोक-४१ , अयोध्या कांड , विंश: सर्ग: .पृष्ठ-२३९ ]
  [तात !तुम्हारे निकट रहने पर भी इस प्रकार सौतों से तिरस्कृत   रही हूँ , फिर तुम्हारे परदेस चले जाने पर मेरी क्या दशा होगी ? उस दशा में मेरा मरण तो निश्चित है ]

इसी सन्दर्भ में माता कौशल्या पति द्वारा रानी कैकेयी की तुलना में अपनी उपेक्षा किये जाने की वेदना अभिव्यक्त करते हुए कहती हैं-
''अत्यन्तं निग्रिहॆतस्मि.............वाप्य्थ्वावारा '' [उपरोक्त ,श्लोक-४२ ]
[पति की ओर से मुझे सदा अत्यंत तिरस्कार अथवा कड़ी फटकार ही मिली है ,प्यार और सम्मान कभी नहीं प्राप्त हुआ है .मैं कैकेयी की दासियों के बराबर अथवा उनसे भी गयी बीती समझी जाती हूँ ]

 सौत ककेयी के राजमहल में वर्चस्व की व्याख्या करते हुए माता कौशल्या श्री राम से कहती हैं -
''यो हि माम् सेवते .........जानो नाभिभाश्ते ''[उपरोक्त ,श्लोक-४३ ]
 [जो कोई मेरी सेवा में रहता या मेरा अनुसरण करता है ,वह भी कैकेयी के बेटे को देखकर चुप हो जाता है ,मुझसे  बात  नहीं करता ]
             सौत के ऐसे आतंक से डरी माता कौशल्या श्री राम वनगमन पर अपनी मार्मिक दशा का उद्घाटन करते श्री राम से कहती हैं -
''नित्य क्रोध्तया .....दुर्गता '' [उपरोक्त ,श्लोक-४४ ]
[बेटा इस दुर्गति में पड़कर मैं सदा क्रोधी स्वाभाव के कारण कटुवचन बोलने वाले उस कैकेयी के मुख को कैसे देख सकूंगी ]
सौतिया डाह से भयाक्रांत माता कौशल्या जब श्री राम के साथ ही वनगमन का प्रस्ताव रखती हैं तब उनके ह्रदय की वेदना को क्या श्री राम ने आज  और अभी जाना था ?-
''आसां राम सपत्नीनाम .........पितार्पेक्षाया '' [अयोध्या काण्ड , चतुर्विंश: सर्ग: ,श्लोक -१९ ,२० ]
[बेटा राम ! अब मुझसे इन सौतों के बीच में नहीं रहा जायेगा .काकुत्स्थ !यदि पिता की आज्ञा का पालन करने की इच्छा से तुमने वन जाने का ही निश्चय किया है तो मुझे भी वन वासिनी हरिणी की भांति वन में ही ले चलो]
             विचारणीय है कि जन्म से वनगमन के मध्य श्री राम ने अपनी बाल्यावस्था   ,किशोरावस्था  व् प्रारंभिक युवावस्था में माता के प्रति जो सौतेली माताओं का [विशेषकर रानी कैकेयी ] जो व्यव्हार देखा क्या उसने ही श्री राम ह्रदय में एक पत्नी व्रत का बीज रोप दिया था ?सौतेली माता द्वारा  निज जननी का अपमान कौन संतान सहन कर सकती है ? निश्चित रूप से श्री राम द्वारा इसी असहनीय स्थिति ने एक पत्नी व्रत हेतु प्रेरित किया होगा क्योंकि जीवन के इसी भाग में मानव सर्वाधिक  उत्साही प्रवर्ति वाला व् अन्याय के विरूद्ध सक्रिय  होता है .
                  सौतेली माताओं के निज जननी के साथ दुर्व्यवहार के अतिरिक्त जो दूसरा कारण श्री राम द्वारा एक पत्नी व्रत लिए जाने का प्रकट होता है वो है -महान पिता राजा दशरथ द्वारा राम माता के साथ उपेक्षापूर्ण  बर्ताव किया जाना   .राजा दशरथ की यह स्वीकारोक्ति श्री राम जननी के प्रति किये गए उनके उपेक्षा पूर्ण बर्ताव को ही प्रदर्शित करती है -
''यदि सत्यम ............कृते तव '' [द्वादश:सर्ग: श्लोक-६७,६८ ,६९ ]
 [यदि कहूं कि श्री राम को वनवास देकर मैंने सत्य का पालन किया है .........यदि राम वन को चले गए तो कौशल्या मुझे क्या कहेगी ?उसका ऐसा महँ अपकार करके मैं उसे क्या उत्तर दूंगा ?हाय !जिसका पुत्र मुझे सबसे अधिक प्रिय है , वह प्रिय वचन बोलने वाली कौशल्या जब जब दासी , सखी , पत्नी , बहिन और माता की भांति मेरा प्रिय करने की इच्छा से मेरी सेवा में उपस्थित होती थी तब तब उस सत्कार पाने योग्य देवी का भी मैंने तेरे[कैकेयी] ही कारण कभी सत्कार नहीं किया ]
       निश्चित रूप से श्री राम के बाल व् किशोर ह्रदय पर धर्माचारी  पिता द्वारा निज जननी के साथ किये गए इस भेदभाव पूर्ण व्यव्हार का व्यापक प्रभाव पड़ा होगा .''इतना महान  पिता भी निजी जीवन में क्यों आदर्शों व् मर्यादाओं की उपेक्षा का दोषी बन जाता है ?क्या विराट व्यक्तित्व को बहुपत्नी रखने का दंड अपनों की दृष्टि में ही गिरकर चुकाना नहीं पड़ता ?''-क्या इसका विश्लेषण श्री राम ने नहीं किया होगा ?
            कितने लाचार हो उठते हैं राजा दशरथ रानी  कैकेयी के समक्ष ! राजा दशरथ को  न  केवल  महारानी  कौशल्या की दृष्टि में अपितु रानी सुमित्रा की दृष्टि में भी दोषी बन जाने का डर सताने लगता है -
''विप्रकारम च ........विश्व शिष्यती'' [उपरोक्त ,श्लोक-७१ ]  
 [श्री राम के अभिषेक का निवारण और उनका वन की और प्रस्थान देखकर निश्चय ही सुमित्रा भयभीत हो जाएगी फिर वह कैसे मेरा विश्वास करेगी ? ]
           संभव है ऐसी विवशता से टकराते पिता को श्री राम बाल्यावस्था से देखते रहे हो .कौन बालक अपने महान पिता के जीवन के इस विवश-अध्याय से शिक्षा न लेगा ?
                   एक अन्य तथ्य पर भी ध्यानाकर्षण इस विषय में उपयोगी होगा .जब रानी कैकेयी की दासी मंथरा उन्हें श्री राम के राज्य अभिषेक का समाचार सुनती है तब वे हर्षित होकर आनंदमग्न हो जाती हैं .यथा -
''अतीव सा  संतुष्ट कैकेयी ..........राज्येभिशेक्श्यति'' [अयोध्या कांड ,श्लोक ३२ ,३३ ,३४ , ३५ ]
[कैकेयी  मन ही मन अत्यंत संतुष्ट हुई .विस्मित विमुग्ध हो मुस्कुराते हुए उसने कुब्जा को पुरस्कार के रूप में एक बहुत सुन्दर दिव्य आभूषण  प्रदान किया .कुब्जा को वह आभूषण देकर हर्ष से भरी रमणी शिरोमणि   कैकेयी ने पुन: मंथरा से इस प्रकार कहा -मन्थरे यह तूने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया .तूने मेरे लिए जो यह प्रिय संवाद सुनाया उसके लिए मैं तेरा और कौन सा उपकार करूं ? मैं भी राम और भरत में कोई भेद नहीं समझती .अत:यह जानकर कि राजा श्री राम का अभिषेक होने वाला है ,मुझे बड़ी ख़ुशी हुई है ]
                श्री राम के प्रति ऐसे स्नेही भाव रखने वाली रानी कैकेयी को जब मंथरा सचेत करती है कि श्री राम का राज्याभिषेक  हो जाने से उनकी माता महारानी कौशल्या का मान बढ़ जायेगा तब रानी कैकेयी के उद्गार  देखिये  -
'एवमुक्त्वा .........भारतं क्षिप्र्मद्याभिशेचाये'' [अयोध्या कांड ,नवम सर्ग  ,श्लोक-१ , २ ,पृष्ठ-२०० ]
[मंथरा के ऐसा कहने पर कैकेयी का मुख क्रोध से तमतमा उठा .वह लम्बी और गरम साँस खींचकर इसप्रकार बोली-कुब्जे ! मैं श्री राम को शीघ्र ही यहाँ  से वन में भेजूंगी और तुरंत ही युवराज के पद पर भरत का अभिषेक करुँगी ]
''एष में जीवित..........य्द्य्भिशिच्य्ते '' [उपरोक्त ,श्लोक ५९ ,पृष्ठ-२०३ ]
[यदि श्री राम का राज्याभिषेक हुआ तो यह मेरे जीवन का अंत होगा ]
ध्यातव्य है कि सौतिया दाह रानी कैकेयी के ममतामयी भावों पर हावी हो गया था .यथा -
''एकाहमपि   .....मृत्र्मम''[द्वादश सर्ग ,श्लोक-४८ अयोध्या कांड ]
[यदि एक दिन भी महारानी  कौशल्या को राजमाता होने के नाते दूसरे लोगों से अपने को हाथ जोड़वाती   देख लूंगी तो उसी समय मैं अपने लिए मर जाना ही अच्छा समझूँगी ]
             क्या श्री राम के व्यक्तित्व निर्माण के समय राजा दशरथ की रानियों अर्थात माताओं के पारस्परिक संबंधों का प्रभाव नहीं पड़ा होगा ? क्या वे बाल्यअवस्था से यह अनुभव नहीं करते होंगे कि माता कैकेयी का व्यव्हार उनके प्रति कैसा है और उनकी जननी के प्रति कैसा ? राजा दशरथ का श्री राम के प्रति स्नेह  जगत  विदित  है .चरों  पुत्रों  में सर्वाधिक  प्रेम वे ज्येष्ठ पुत्र श्री राम को ही करते थे किन्तु श्री राम की जननी की तुलना में उनका प्रेम छोटी रानी कैकेयी के प्रति अधिक था . .यथा-
'सवृद्ध्स्तारुनी ........प्राणेभ्योअपिगरियसि ''[श्लोक-२३ अयोध्या कांड ,दशम:सर्ग, पृष्ठ-२०५ ]

 [राजा बूढ़े थे और उनकी वह पत्नी [कैकेयी] तरुणी थी ,अत:वे उसे अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते थे ]
 राजा दशरथ के द्वारा अधिक मान देने के कारन ही रानी कैकेयी घमंड में भरकर अपने से बड़ी रानियों को अपमानित करने से भी नहीं चूकती थी .श्री राम के राज्याभिषेक हेतु मंत्र उसे इसी दुराचरण की स्मृति दिलाती है -
'दर्पान्निराकृता पूर्वं   .................याप्येत   ''[श्लोक 37 ,अयोध्या कांड ,अष्टम:सर्ग:]

 [तुमने पहले पति का अत्यंत प्रेम प्राप्त होने के कारण घमंड में आकर जिनका अनादर किया था ,वे ही तुम्हारी सौत श्री राम माता कौशल्या पुत्र की राज्य प्राप्ति से परम सौभाग्यशालिनी हो उठी हैं .अब वे तुमसे बैर का बदला क्यों नहीं लेंगी ?]
                    राजमहल हो अथवा साधारण घरपरिवार जहाँ भी एक पुरुष ने कई विवाह किये हैं उनके साथ वह समान व्यवहार करने में असफल रहता है .इसके दुष्परिणाम स्त्रियों के साथ साथ उसकी संतानों  को भी आजीवन भोगने पड़ते हैं .श्री राम ने इन परस्थितियों को समीप से देखा-भोगा था .एक आदर्श चरित्र के निर्माण में उसके जीवन की परिस्थितियाँ अहम् भूमिका निभाती हैं .समीप से निज जननी की व्यथा ,महान पिता की विवशताओं व् वर्चस्व के छिन  जाने के प्रति सशंकित रानी कैकेयी के असंतुलित आचरण की जड़ में श्री राम ने बहुपत्नी विवाह को ही कारण पाया होगा .  बहुपत्नी विवाह के दुष्परिणामों से बचने व् आने वाली पीढ़ियों को एक आदर्श प्रदान करने हेतु ही श्री राम ने एक पत्नी व्रत लिया और आजीवन उसका कठोरता से पालन किया .श्री राम के मुखारविंद से निकले ये उद्गार ['शूर्पणखा-प्रसंग'' में] उनके द्वारा लिए गए एक पत्नी व्रत की महत्ता को प्रदर्शित करते हैं.देखें- 
    ''कृतदारोअस्मि ......ससपत्नता ''[श्लोक-२,अरण्य कांड ,अष्टादश:: सर्ग:]
[आदरणीय देवी ! मैं विवाह कर चुका हूँ .यह मेरी प्यारी पत्नी विद्यमान है .तुम जैसी स्त्रियों के लिए तो सौत का रहना अत्यंत दुखदायी ही होगा ]

'राम:सीता:...सुन्दरी ''[अध्यात्म  रामायण ,पंचम सर्ग:,पृष्ठ-११७]
[तब रामचंद्र जी ने नेत्रों से सीता जी की ओर संकेत करके मुस्कुराकर कहा -हे सुन्दरी ! मेरी तो यह भार्या मौजूद है ,जिसको त्यागना असंभव है .इसके रहते हुए तुम जन्म  भर सौत डाह से जलती हुई किस प्रकार रह सकोगी ?]
कितनी गूढता से श्री राम सपत्नी डाह को समझ चुके  थे !  सीता जी से विवाह के समय एक पत्नी व्रत के प्रति चाहे श्री राम का झुकाव मात्र रहा हो किन्तु जीवन में घटित दुर्घटनाओं  ने उन्हें इस व्रत पालन पर दृढ रहने की शक्ति प्रदान की .''झुकाव मात्र'' मैंने इसलिए कहा है क्योंकि ''श्रीरामचरित मानस '' के अरण्य-कांड में श्री लक्ष्मण   जी द्वारा कहे गए ये वचन प्रमाणित करते हैं कि   श्री राम द्वारा लिए गए एक पत्नी व्रत का संज्ञान उनके अनुज तक को नहीं था तभी तो श्री लक्ष्मण शूर्पणखा से कहते हैं-
''सुन्दरि सुनु मैं उन्ह कर दासा ,पराधीन नहि तोर सुवासा ,
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा ,जो कछु करहि उनहि सब छाजा ''
[श्री रामचरितमानस,पृष्ठ-५७५ ,आहूजा प्रकाशन ]

          निश्चित रूप से यदि श्री लक्ष्मण को श्री राम के एक पत्नी व्रत का संज्ञान नहीं था .यदि वे इस से परिचित होते तो शूर्पणखा को पुन:प्रणय निवेदन  हेतु श्री राम के समक्ष  नहीं भेजते  .
       श्री राम की एक पत्नी व्रत के प्रति दृढ़ता  शनै  शनै  ही सशक्त होती गयी होगी ..बाल्यावस्था  में निज जननी  का अन्य सौतों द्वारा अनादर ,सौतिया डाह के कारण स्नेहमयी माता कैकेयी का कटु आचरण ,पिता का माता कैकेयी द्वारा किया गया तिरस्कार व् पिता का एक रानी के प्रति अधिक मोह हो जाने के कारण निज जननी की उपेक्षा व् पिता की विवशताओं का प्रत्यक्ष  दर्शन आदि कारणों ने श्री राम को एक पत्नी व्रत पर अटल रहने हेतु संबल प्रदान किया .निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि  श्री राम के  एक पत्नी व्रत धारण के मूल में राजा दशरथ के बहुपत्नी विवाह के दुष्परिणाम ही रहे होंगे .
[शोध ग्रन्थ-श्री मद वाल्मीकीय रामायण[गीता प्रेस ] ,अध्यात्म रामायण[गीता प्रेस ] ,श्री राम चरित मानस [आहूजा  प्रकाशन ]  


             डॉ शिखा कौशिक ''नूतन ''


      


                                      

सोमवार, 21 जनवरी 2013

राहुल भावुक मत होना !

 राहुल भावुक मत होना !


All hail Rahul Gandhi @ Congress Chintan Shivir

रोक लो आंसू आँखों में ,  माँ से इतना कहना ,
साथ तुम्हारे पूरा भारत , राहुल भावुक मत होना !

दादी की नृशंस हत्या , प्रिय -पिता बलिदान ,
सहे दर्द चुप रहकर तुमने हिम्मत -दामन थाम ,
आज कहा सो कहा मगर फिर ना धीरज खोना !
साथ तुम्हारे पूरा भारत , राहुल भावुक मत होना !

मूर्ख विरोधी हंसी उड़ाते , सुनकर दर्द तुम्हारा ,
अब मजबूत ह्रदय  को कर  लो , यह परामर्श हमारा ,
आरोपों की आंच में तपकर बनना सच्चा सोना !
साथ तुम्हारे पूरा भारत , राहुल भावुक मत होना !

क्या खोया जीवन में तुमने हमको है अहसास ,
सारे दर्द दबा लेना लेकर के लम्बी सांस ,
समझ अकेला स्वयं को अब पलकें नहीं भिगोना !
 साथ तुम्हारे पूरा भारत , राहुल भावुक मत होना !

          शिखा कौशिक 'नूतन'


रविवार, 20 जनवरी 2013

शहीद का बेटा है राहुल ! .राहुल के ज़ज्बे को सलाम !

 Rahul GandhiPower should be used to empower people: Rahul (© Reuters)
 शहीद का बेटा है राहुल ! .राहुल के ज़ज्बे को सलाम !
भाजपा के वरिष्ठ नेता व् राज्य सभा में विपक्ष के नेता श्री अरुण जेटली ने श्री राहुल गाँधी को  कॉंग्रेस पार्टी उपाध्यक्ष बनाये जाने को ''वंशवादी लोकतंत्र '' का नाम दिया है .यही और इन जैसे अन्य नेता व् इनके समर्थक तब वंशवाद का जिक्र भी नहीं करते जब एक शहीद की पत्नी अपने पुत्र को भी सैनिक बनाने का प्रण लेती है .क्या अंतर है सोनिया जी व् शहीद की पत्नी में ? बस यही ना कि शहीद ने शहादत दी तो पूरा   देश उसके बलिदान के आगे नतमस्तक हो गया और जब राजीव जी की हत्या हुई तब विपक्ष इसमें अपना फायदा ढूँढने लगा .इंदिरा जी की निर्मम हत्या को राहुल जी ने एक छोटे बालक के दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर हर किसी को भावुक कर दिया .उस समय अपने  पिता के ह्रदय की व्यथा को गहराई से महसूस किया था बालक राहुल ने . कल जब राहुल जी को उपाध्यक्ष बनाया गया तब सब ओर से उन्हें शुभकामनाओं से नवाज़ा गया पर सोनिया जी ने उनके कमरे में जाकर आँखों में आँसू के साथ उन्हें राजनीति की हकीकत से रूबरू कराया कि ''राजनीति एक ज़हर है '' क्या गलत कहा उन्होंने ? जब देश के लिए जान कुर्बान करने वाले नेहरू -गाँधी को लांछित करने में विपक्ष नई नई साजिशें रचता रहता हो और जनता द्वारा चुनकर आने पर भी गाँधी परिवार के हर सदस्य पर वंशवाद का आरोप लगा दिया जाता हो तो ऐसी राजनीति को ज़हर कहना ही बेहतर है .जो भी हो राहुल जी ने चुनौती को आत्मविश्वास के साथ स्वीकार किया है .राहुल जी को उपाध्यक्ष बनाया जाना ''वंशवाद '' नहीं परिवार की देश -सेवा के प्रति कटिबद्धता का प्रत्यक्ष उदाहरण है .हर शहीद के बच्चे में जो देश सेवा का जूनून होता है वो राहुल जी में भी है .उनके इस ज़ज्बे को सलाम !

                           शिखा कौशिक 'नूतन'


हम हिंदी चिट्ठाकार हैं


हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

 

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  हम हिन्दी चिट्ठाकार हैं My Image
 हम हिन्दी चिट्ठाकार हैं

हम खुद अपनी सरकार  हैं 
 हम हिन्दी चिट्ठाकार हैं !

सच लिखने से घबराते नहीं ,
राज़  किसी का छिपाते नहीं ,
लिखते हैं वो जो है सही ,
जैसी हो घटना बताते वही ,
हम सच के पहरेदार हैं ,
 हम हिन्दी चिट्ठाकार हैं

लिखते  कविता , कहानी व् गीत ,
नूतन सृजन से हमको है प्रीत ,
चर्चा मंच सजाते हैं रोज़ ,
कौशल अपना दिखाते हैं खूब ,
हम साहित्यकार हैं 
 हम हिन्दी चिट्ठाकार हैं 
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हमारी वाणी ध्यान से सुनो 
हिंदी में लिखने का पथ तुम चुनो 
                  भावों को दो अभिव्यक्ति का रूप 
                   नित नई  रचना  का ताना -बाना बुनो 
       लाखों में एक परिवार है 
 हम हिन्दी चिट्ठाकार हैं !
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शनिवार, 19 जनवरी 2013

''राहुल '' का राज्याभिषेक

   ''राहुल '' लाखों में एक  का  राज्याभिषेक
 Rahul Gandhi

काँग्रेस- जन की पूर्ण हुई आस आज ये नेक ,
हर्षित होकर मना रहे ज़श्न सभी अनेक ,
जयपुर में हो गया जिनका राज्याभिषेक ,
ऊर्जावान -साहसी  ''राहुल '' लाखों में एक !!
   
                शिखा कौशिक 'नूतन'

चिंतन शिविर के बाद करना है ये काम


करना है सतत प्रयास , हो देश का उत्थान ,
चिंतन शिविर के बाद करना है ये काम ,
है कठिन पथ  , कष्ट हैं महान ,
उठो , जागो -राहुल जी अब कहाँ विश्राम !

           शिखा कौशिक 'नूतन '

MR.rahul gandhi-change your work style

बुधवार, 16 जनवरी 2013

''सोचो राहुल जी....''

आज फेसबुक पर ये उद्गार पढ़े -

Rahul Gandhi Yuva Panchayat क्या राहुल जी आम आदमी के साथ हैं। आज यह एक बड़ा सवाल हिन्दुस्तान के युवाओं और जनमानस के मन में पैदा हो रहा है। हजारों आम युवा राहुल जी से मिलने दस जनपथ जाते हैं लेकिन उनकी वापिसी निराशाजनक होती है जब राहुल जी उनकी फाइलों को अपने सहयोगी कनिष्क जी को दे देते हैं। आखिर ऐसे केसे आम युवा कांग्रेस के करीब आउगा।सोचो राहुल जी....''
निश्चित रूप से राहुल जी को सुनना व् सोचना ही होगा  
यह  स्वागत  योग्य  है  कि श्री  राहुल गाँधी भारतीय राजनीति में एक बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं किन्तु बड़ी भूमिका के साथ  साथ उन्हें  अपनी  कार्य  शैली  में भी  बड़ा  अंतर  लाना  होगा  .पिछले  दिनों  श्री सलमान  खुर्शीद  द्वारा की गयी टिप्पणी को भी सकारात्मक  नज़रिए  से देखा जाना चाहिए .राहुल को अब जुगनू की भांति नहीं सूर्य की भांति चमकना होगा .उन्हें जनता के समक्ष निरंतर उपस्थित रहना होगा .यूं.पी. के चुनाव के बाद एक माह तक गायब रहना ,दामिनी के साथ हुए दुराचार मुद्दे पर जनता के साथ खड़े न होने से -जनता में यह सन्देश प्रेषित होता  है कि-'हमारा नेता गंभीरता के साथ हमारी समस्याओं के प्रति जागरूक नहीं है' -


'जुगनू नहीं तू आफ़ताब बन चमकना सीख 
करनी है सियासत तो कुछ दांव-पेंच सीख '

                                         राहुल जी को अपने व् अपने परिवार के खिलाफ लगाये जाने वाले आरोपों का भी खुलकर विरोध करना होगा क्योंकि उनकी चुप्पी को इस रूप में प्रसारित किया जाता है कि 'यदि ये आरोप निराधार हैं तो राहुल व् गाँधी परिवार इनका विरोध क्यों नहीं करता '-

       दुश्मन  लगाना चाह रहा दामन पर तेरे दाग 
          मायूस हो यूं चुप न बैठ पुरजोर आज चीख '

                                                      देश कि सभी प्रधान  समस्याओं पर अपने नज़रिए से राहुल जी को चाहिए कि वे जनता को अवगत कराते रहे  .ये न हो कि --भट्टा परसौल पर तो आप अपना विरोध दर्ज कराये पर दिल्ली पुलिस द्वारा रामलीला मैदान में आम जनता पर मध्य रात्रि में किये गए अत्याचार पर कुछ न कहें .आपको महगाई जैसे मुदों पर अपनी राय से जनता को अवगत कराना चाहिए ताकि जनता में यह सन्देश जाये कि 'हमारा प्रिय नेता हमारी समस्याओं के प्रति संवेदनशील है '-


'तू वतनपरस्त है  कर मुल्क़ की ख़िदमत 
मुफ़लिसी पर चोट कर ना मांगें कोई भीख '

                

   राहुल जी को यह भी ध्यान रखना होगा कि 'वे एक राष्ट्रीय नेता हैं '.किसी भी प्रदेश के चुनावों में उन्हें स्वयं को झोंक देने की जरूरत  नहीं है .उनका काम है राज्य के पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करना ,अनुशासित करना .उत्तर प्रदेश के हाल में हुए चुनावों में राहुल जी ने तो अपनी सारी ताकत झोक दी और प्रदेश के पार्टी नेता हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहे जिसके कारण राहुल जी की छवि को धूमिल करने का कुत्सित प्रयास किया गया -

              '  मासूम  रियाई की मक्कारियों से बच 
                   कई खा  चुके हैं धोखा इसकी गवाह तारीख़ '

                                     राहुल जी को अपने आस पास चापलूसों,चाटुखोरों के जमावडे को भी रोकना होगा .उन्हें जनता के सीधे संपर्क में रहना होगा तभी आने वाले कल में वे पूरे भारत को कुशल नेतृत्व देने में सक्षम हो पायेंगें -
'अपने में ला सिफत सिफलों  को दूर रख 
तेरी फ़िरासत देखकर दुश्मन भी जाये रीझ '
                                               शिखा कौशिक 


शनिवार, 12 जनवरी 2013

मर्यादा का ले नाम मत अपना पल्ला झाड़ पुरुष !

 मर्यादा का ले नाम मत अपना पल्ला झाड़ पुरुष !
 Man beating woman,silhouette photo

स्त्री के विरुद्ध किये जाने वाले अपराधों के लिए स्त्री को उत्तरदायी ठहराने  का चलन युगों युगों से रहा है .दिल्ली गैग रेप [१६ दिसंबर २०१२ ] की दुर्घटना के बाद से जहाँ आम भारतीय जनता की सोच इस ओर भी मुड़ी है कि-' हमें अपने पुत्रों को भी चरित्रवान बनाने की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है न कि केवल पुत्रियों पर मर्यादा के नाम पर प्रतिबन्ध लगाने की'  वही संस्कृति के रक्षक बनने वाले कई पुरुष पुन:  जनता को उसी लिंग-भेदी मानसिकता की ओर लौटा ले जाना चाहते हैं .जिसने मानव के सम मानवी को दोयम  दर्जे का प्राणी मात्र बनाकर छोड़ दिया है .वास्तविकता तो  ये है कि बलात्कार व् स्त्री हरण जैसी दुर्घटनाओं के लिए सृष्टि के आरम्भ से ही स्त्री द्वारा मर्यादा उल्लंघन उत्तरदायी नहीं है बल्कि पुरुष द्वारा स्त्री के साथ किया जाने वाला छल व् बल प्रयोग उत्तरदायी है .एक अन्य तथ्य भी यहाँ उल्लेखनीय है कि इतिहास से लेकर वर्तमान तक बलात्कार व् इसके प्रयास की दुर्घटनाएं मर्यादित नारी के साथ ही घटित हुई हैं .
                             दम्भी व् अल्पज्ञानी पुरुष जब माता  सीता द्वारा मर्यादा -उल्लंघन करने का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तब वे विस्मृत कर देते हैं कि माता सीता ने '' 'अतिथि देवो भव:' के आर्य  संस्कार का पालन करते हुए ही ब्राह्मण वेश धारी रावण का अतिथि-सत्कार किया था .देखें -
'' द्विजतिवेशेन.................तथागतं ''[श्लोक३५ ,अरण्य कांड  ,सप्तचत्वारिंश :-श्रीमद वाल्मीकीय रामायण '']
अर्थात-वह[रावण]ब्राहमण वेश में आया था ,कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था .ब्राह्मण-वेश में आये हुए अतिथि की उपेक्षा असंभव थी}
                   इस   प्रसंग में यह भी विचारणीय है  कि रावण आर्य-संस्कृति से भली-भांति परिचित था और जानता  था कि आर्य-नारी द्वार पर आये ब्राह्मण अतिथि की  उपेक्षा कदापि नहीं कर सकती इसी कारण रावण ने छद्म ब्राह्मण-रूप धरकर छल से माता  सीता का हरण किया यहाँ लक्ष्मण  -रेखा को पार  करने अथवा मर्यादा उल्लंघन का कोई उल्लेख ''श्रीमद वाल्मीकिरामायण '' '' श्री रामचरितमानस '' ''श्री अध्यात्मरामायण '' -में नहीं आता .[सीता-हरण प्रसंग पढ़ें ]
              ''श्रीरामचरितमानस''के 'लंका  कांड ''में ''लक्ष्मण-रेखा'' का उल्लेख आता है  जहाँ मंदोदरी रावण को श्री राम से युद्ध न करने की  सलाह देते हुए कहती हैं कि -
''रामानुज लघु रेख खिचाई ,सोउ  नहि नाघेउ असि मनुसाई ''
[अर्थात आपकी (रावण)ऐसी तो बहादुरी है कि लक्षमण जी ने  धनुष की रेखा खींच दी थी ;वह आपसे लांघी न गयी ]
               यहाँ भी यह स्पष्ट नहीं है कि वह रेखा  लक्ष्मण  जी ने सीता-हरण प्रसंग से पूर्व माता सीता को पार न करने की सलाह देते हुए खीची थी अथवा अन्य किसी प्रयोजन से  , सीता हरण से पूर्व अथवा पश्चात .किस उद्देश्य से ,कब व् कहाँ ये रेखा खींची गयी -यह एक अलग शोध का विषय है पर माता सीता ने किसी लक्ष्मण रेखा को पार किया इसका कोई प्रमाण नहीं है . इसके अतिरिक्त पुरुष-वर्ग का ये दावा भी निराधार है कि माता सीता को मर्यादा-उल्लंघन का दंड भुगतना पड़ा .वास्तव में माता सीता को उसी पितृ सत्तात्मक  समाज की भेदभाव पूर्ण मानसिकता का दंड भोगना पड़ा जो  अग्नि-परीक्षा द्वारा अपनी शुचिता प्रमाणित करने वाली स्त्री को भी पवित्र नहीं मानता और इसी के परिणामस्वरूप अहिल्या  -उद्धार करने वाले उदार पुरुष श्रीराम को भी आर्य-कुल श्रेष्ठ  माता सीता के त्याग के लिए विवश होना .
                                                         पुरुष   के छल-बल  के उदाहरण यत्र-तत्र-सर्वत्र साक्ष्य-रूप में बिखरे पड़ें हैं .इंद्र  द्वारा महर्षि  गौतम का छद्म रूप धरकर देवी अहिल्या से बलात्कार छली पुरुष के छल का  उदाहरण है अथवा स्त्री के मर्यादा -उल्लंघन का ?   प्रह्लाद -माता साध्वी  कयाधू का इंद्र द्वारा हरण को  किस श्रेणी में रखगें  आप ?    आकाश -मार्ग से ब्रह्मा जी के पास जाती अप्सरा पुञ्जक्स्थला [वाल्मीकि रामायण ,युद्धकाण्ड सर्ग-१३ ] व् अपने प्रिय नलकूबर से मिलन को लालायित हो उसके समीप जाती रम्भा से रावण का बलपूर्वक बलात्कार[वाल्मीकि रामायण ,उत्तर कांड सर्ग-२६ ] इन दोनों अप्सराओं की कौन सी मर्यादा उल्लंघन को प्रमाणित करता है ?कदापि नहीं ! ये सब मर्यादाहीन पुरुष के दुराचरण के परिणाम हैं .दिल्ली गैग रेप की शिकार युवती को भी छह दरिंदों में से एक तथाकथित नाबालिग राजू ने ''बहन जी '' कहकर छल से बस में चढ़ाया था .पुरुष का छल-बल पुरातन काल से वर्तमान तक स्त्री विरुद्ध अपराधों का कारण रहा है जो आज समाज में उभरकर सामने आ रहा है .''शादी का झांसा देकर '' ''नौकरी का लालच देकर '' युवतियों को फँसाना  अथवा प्रेम-जाल में फँसाकर यौन-शोषण कर नरकतुल्य जीवन भोगने के लिए छोड़ देना- जैसा दुराचरण आज के छली पुरुष की पहचान  बन चुका है . छली पुरुष के लिए मर्यादित आचरण की मांग क्यों जोर नहीं पकड़ पाती  ?क्यों मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के बाद कोई पुरुष इस उपाधि को प्राप्त करने हेतु लालायित नहीं दिखाई पड़ता ? इन सवालों में है जड़ स्त्री विरुद्ध अपराध की .हर बलात्कार के बाद पुत्रियों पर मर्यादित आचरण का फंदा और भी ज्यादा कस दिया जाता है और दुराचारी पुरुष और भी उद्दंडता   के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है .यदि स्त्री विरुद्ध अपराधों में कमी लानी है तो अब पुत्रियों से ज्यादा पुत्रों को मर्यादित करने की आवश्यकता है तभी श्रीराम जैसे पुत्र भारतीय समाज को मिल पायेंगें जो रावण ,बालि जैसे दुराचारियों का अंत करने में सक्षम होंगे और भारतीय समाज में नारी को प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त हो पायेगा .

                        डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन'



शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

हास्य व्यंग्य -मोहन भागवत धन्य-धन्य

हास्य  व्यंग्य  -मोहन भागवत धन्य-धन्य 


It is the mindset towards women which has to be fought: Ashutosh धन्य हैं मोहन भागवत जी .हिन्दू धर्म के सोलह-संस्कारों में से एक सर्वाधिक पवित्र संस्कार विवाह को सौदा जो बतलाया है उन्होंने .लो जी ये भी कोई बात है कि  युगों युगों से इस पवित्र संस्कार को ''विवाह'' ही कहा जाये और यदि पर्यायवाची प्रयोग हो तो ''शादी '' . चिल्लाते... चिल्लाते रहो ''विवाह ...विवाह....शादी... शादी ''.अब बस सही शब्द बोलना सीख लो .विवाह नहीं इसे ''सौदा कहते हैं जी .सबसे ज्यादा परेशान हैं बैंड-बाजे वाले ..बार बार प्रक्टिस कर रहे हैं इस गाने की-आज मेरे यार का सौदा है ...यार का सौदा है मेरे दिलदार का सौदा है .''  एक गाना हो तो तैयारी कर भी लें पर साहब जी यहाँ तो लम्बी लाइन है ऐसे गानों की .सारा मामला ही गड़बड़ हो गया .एक बुजुर्ग गाते जा रहे हैं सड़क पर -कोई मेरा भी सौदा करा दे तो फिर मेरी चाल देख ले ...जरा जम के भैय्या  '' . उधर देखिये वैडिंग हॉल में धूम मची हुई है डी.जे.पर -''मुबारक हो तुमको ये सौदा सुहाना ...'' जवान खून की बात मत पूछिए .बाइक पर गुनगुनाते जा रहे हैं साहबजादे -''मुझसे सौदा करोगी ****मुझसे सौदा करोगी .अब फिल्मकारों के लिए भी चुनौती है फिल्म के शीर्षक  रखना .राज श्री वाले सोच रहे होंगे -''विवाह या सौदा '' ''एक सौदा ऐसा भी '' रख लें तो फिल्म सामाजिक क्रांति ला देगी .
                                एक ओर  क्रांति  का विषय है पंडित वर्ग के लिए . अब जिजमान आकर चरण -स्पर्श करते हुए निवेदन करते हैं -''पंडित जी मेरे बेटे का ''सौदा -मुहूर्त ''  तो निकाल दीजिये ''  अथवा ''पंडित जी मेरी बिटिया की जन्म -पत्रिका बाँच कर बताइए तो सही इसका ''सौदा '' कब व् कैसे लड़के से होगा ?'' अब पंडित जी के स्वर भी पलटे हुए हैं ,वे गंभीर वाणी में कहते हैं -''जिजमान आपकी पुत्री की कुंडली में मांगलिक दोष है इसका सौदा किसी मांगलिक लड़के के साथ ही कीजियेगा .''
                      छपाई वाले भी क्रांति के इस युग से प्रभावित हुए हैं .अब विवाह के निमंत्रण कार्ड पर छप रहा है -''शुभ सौदा निमंत्रण ''.कार्ड के ऊपर दाई ओर छपता है -''शुभ सौदा '' और  अन्दर कार्ड का प्रारूप इस प्रकार है -'आयुष्मति '' व् ''चिरंजीव ''के सौदा संस्कार की सुमधुर बेला पर आपको सादर आमंत्रित करते हैं ''
                  अब हर सरकारी व् गैरसरकारी फार्म भरते समय इस कॉलम को भी ध्यान से भरे -
''विवाहित /अविवाहित '' के स्थान पर ''सौदा हुआ /सौदा नहीं ''
                       एक साथ इतने क्रन्तिकारी परिवर्तन समाज में लाकर मोहन भगवत जी ने उत्सव  का माहौल भारतीय  समाज में पैदा कर दिया है .बस भगवत जी इस प्रश्न का जवाब आप हमें ई.मेल पर जरूर भेज दें -क्या आपने सौदा किया है  ?यदि नहीं तो क्यों ?
             जय हिन्द ! जय भारत !

बुधवार, 9 जनवरी 2013

रेप इण्डिया में नहीं भारत में ही होते हैं !
 Is crime against women an issue of 'Bharat' versus 'India'?Mohan Bhagwat
भागवत जी ने जो कहा वो बिना सोचे समझे कहा है यदि वे पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय संस्कृति का गूढ़ अध्ययन कर बयान देते तो ऐसा बयान कभी न देते कि रेप  भारत में नहीं इण्डिया में हो रहे हैं .पाश्चात्य संस्कृति के अनुसरनकर्ता तो आज लिव-इन जैसे संबधों को बढ़ावा दे रहे हैं जहाँ न कोई बंधन है ,न जिम्मेदारी .जितने दिन चाहो मौज मनाओ और अलग हो जाओ और इन संबंधों से उत्त्पन्न संतान को सड़क पर कुत्तों को नोचने के लिए छोड़ दो .इस वर्ग के लोग विवाह जैसी संस्था में विश्वास ही नहीं करते और एक से अधिक पुरुष/स्त्री शारीरिक संबंधों में इन्हें कुछ गलत नज़र नहीं आता .रेप करता है वो वर्ग जो भारतीय संस्कृति के द्वारा विवाह पूर्व शारीरिक संबंधों को अवैध  व् विवाह के पश्चात् एक स्त्री से संम्बंध रखने पर जोर देता है और नैतिक रूप से कमजोर अपनी इन्द्रियों को वश में न रख पाने वाला पुरुष ये कुकृत्य कर डालता है .भागवत जी को अपने बयान देते समय बहुत कुछ सोच लेना चाहिए ऐसी मेरी सलाह है उन्हें !
                           जय हिन्द ! जय भारत !
                      शिखा कौशिक 'नूतन '

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

 रामायण में निर्देशित   बलात्कार के लिए दंड -एक विश्लेषण


from google

दिल्ली में हुए गैंगरेप  की शिकार युवती के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे भारतीय समाज को झंकझोर डाला है .आरोपियों पर सख्त से सख्त व् शीघ्र अति शीघ्र सजा की मांग को लेकर जनता का सैलाब सड़कों पर उतर आया है .अधिकांश जनसमूह इन अपराधियों को फांसी की सजा दिए जाने के पक्ष में है तो कानूनविदों की राय है कि भारतीय कानून के अनुसार इन्हें केवल उम्रकैद कीसजा  दी जा सकती है .किसी का मत है कि इन्हें हाथी के पैरों   टेल कुचलवा दिया जाये तो कुछ की मांग है कि इन्हें सीधे आग के हवाले कर दिया जाये .कुछ का मत है कि इनके अंग भंग कर इन्हें नपुंसक बना दिया जाये .विगत चालीस वर्षों में महिला विरूद्ध अपराधों में जिस तरह आठ सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है [नवम्बर २०११ में एन.सी.आर.बी.द्वारा प्रकाशित आंकड़े ]  उसके परिपेक्ष्य में मानव समाज के माथे पर कलंक स्वरुप इस अपराध 'बलात्कार' के लिए कड़ी  सजा निर्धारित  करने  का समय  आ गया  है .इसी संदर्भ में हमें हमारे शीर्ष मार्गदर्शक धार्मिक ग्रन्थ ''श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण '' में उल्लिखित इस घिनोने अपराध 'बलात्कार' हेतु दण्डित किये गए पापाचारी पुरुषों से सम्बद्ध प्रसंगों पर विचार करना आवश्यक  ही नहीं समयोचित भी है क्योंकि ''रामायण '' पग पग पर हर भारतीय मनुज को उचित आचरण हेतु निर्देशित करती है .
                                   नारी की मान -मर्यादा को रौदने वाले इस दुष्कर्म का सूत्रपात करने का श्रेय देवराज इंद्र को जाता है .महामुनि गौतम की भार्या देवी अहल्या के रूप-सौन्दर्य पर आसक्त होकर काम के वशीभूत इंद्र ने महामुनि गौतम का छद्म रूप धरकर देवी अहल्या से बलात्कार किया .इस दुष्कर्म के परिणामस्वरूप  इंद्र को जो दंड  दिया गया उसका उल्लेख   ''श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण'' में इस प्रकार वर्णित है -
[''मम रूपं समास्थाय ....तत्क्षनात''   (श्लोक-२७,२८ ,बालकाण्डे  अष्टचत्वारिंश :  सर्ग: पृष्ठ १२६ ) ]
''अर्थात दुर्मते तूने मेरा रूप धारण कर यह न करने योग्य पापकर्म किया है ,इस लिए तू विफल (अन्डकोशों से रहित ) हो जायेगा .रोष में भरे महात्मा गौतम के ऐसा कहते ही देवराज इंद्र के दोनों अंडकोष उसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़े ]
                 इसके अतिरिक्त 'उत्तर कांड  ' के ' विंश:सर्ग: 'में भी रावण पुत्र मेघनाद [ जो देवराज इंद्र को कैद कर इन्द्रजीत कहलाया ]के  द्वारा कैद कर लिए जाने पर ब्रह्मा  जी मेघनाद को वरदान देकर इंद्र को उसकी कैद से मुक्त कराकर पराजय व् देवोचित तेज़ नष्ट हो जाने से दुखी इंद्र से कहते हैं -
''तम तू दृष्टा... .... ...सुदुष्क्रतम ''[श्लोक-१८ पृष्ठ   -६८९] अर्थात -भगवान ब्रह्मा जी ने उनकी इस अवस्था को लक्ष्य किया और कहा -शतक्रतो !यदि आज तुम्हे इस अपमान से शोक और दुःख हो रहा है तो बताओ पूर्वकाल में तुमने बड़ा भारी दुष्कर्म क्यों किया था ?'
''सा ........., .......तदाब्रवीत '' [३० से ३५ श्लोक ,पृष्ठ -६८२ ]-इंद्र !तुमने कुपित और काम पीड़ित  होकर उसके [अहल्या] के साथ बलात्कार किया .उस समय उन महर्षि ने अपने आश्रम में तुम्हे देख लिया ''
'देवेन्द्र  !इससे  उन परम तेज़स्वी महर्षि को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तुम्हे शाप दे दिया .उसी शाप के कारण तुमको इस विपरीत दशा में आना पड़ा -शत्रु का बंदी बनना पड़ा .''
 'उन्होंने शाप देते हुए कहा -'वासव !शक्र !तुमने निर्भय होकर मेरी पत्नी के साथ बलात्कार किया है ,इसीलिए तुम युद्ध में जाकर शत्रु के हाथ में पड़ जाओगे .''
 'दुर्बुद्धे !तुम जैसे राजा के दोष से मनुष्य लोक में भी यह जार भाव   प्रचलित हो जायेगा ,जिसका तुमने यहाँ सूत्रपात किया है .इसमें संशय नहीं है .''
'जो जारभाव से पापाचार करेगा ,उस पुरुष पर उस पाप का आधा  भाग  पड़ेगा और आधा  भाग  तुम पर पड़ेगा   क्योंकि  इसके  प्रवर्तक  तुम्ही  हो .निसंदेह  तुम्हारा  यह स्थान  स्थिर  नहीं होगा  ''
                   वर्णित प्रसंग में उल्लिखित तथ्य इस और संकेत करते हैं कि-उस समय बलात्कारी को नपुंसक बनाना   व् उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा  से उसे विलग कर देना बलात्कार के दंड निर्धारित किये गए थे .
                                      ''उत्तर कांड ''के 'अशीतितम:सर्ग ' में राजा दण्ड द्वारा भार्गव कन्या अरजा के साथ बलात्कार का प्रसंग भी विचारणीय है .गुरु पुत्री द्वारा बार बार सचेत किये जाने पर भी काम के अधीन दण्ड ने बलपूर्वक स्वेच्छाचारवश   अरजा के साथ समागम किया .दंड द्वारा किये गए इस अत्यंत दारुण व् महाभयंकर अनर्थ पर देवर्षि शुक्र तीनों लोकों को दग्ध करते हुए कहते हैं -
[पश्यध्वं....... ....भविष्यति ' -श्लोक ४ से १० पृष्ठ -७८४ ]'अर्थात -देखो शास्त्रविपरीत आचरण करने वाले अज्ञानी राजा दण्ड को कुपित हुए मेरी ओर से अग्नि-शिखा के समान कैसे घोर विपत्ति प्राप्त होती है ' 
'पापकर्म का आचरण करने वाला वह दुर्बुद्धि नरेश सात रात के भीतर ही पुत्र ,सेना और सवारियों सहित नष्ट हो जायेगा .'''खोटे विचारवाले इस राजा के राज्य को सब ओर से सौ योजन लम्बा-चौड़ा है ,देवराज इंद्र ,भारी धूल की वर्षा करके नष्ट कर देंगे .''खोटे विचारवाले इस राजा के राज्य को सब ओर से सौ योजन लम्बा-चौड़ा है ,देवराज इंद्र ,भारी धूल की वर्षा करके नष्ट कर देंगे .''यहाँ जो सब प्रकार के स्थावर-जंगम जीव निवास करते हैं ,इस धूल की भारी वर्षा से सब ओर से विलीन हो जायेंगे  'जहाँ तक दण्ड का राज्य है वहां तक के समस्त चराचर प्राणी सात रात तक केवल धूलि की वर्षा पाकर अद्रश्य हो जायेंगे .'
[इत्युक्त्वा .....ब्रह्मवादिना ,श्लोक-१७,१८ ]'ऐसा कहकर शुक्र ने दूसरे राज्य में जाकर निवास किया तथा उन ब्रह्मवादी के कथनानुसार राजा दण्ड का वह राज्य सेवक,सेना और सवारियों सहित सात दिन में भस्म हो गया .''
                                            स्पष्ट है कि उस काल में बलात्कार को सर्वोच्च धर्मविरुद्ध आचरण मानते हुए ब्रह्म ऋषि   ने राजा दण्ड व् उसके देशवासियों को शाप की आग में जला डाला .राजा दण्ड को अपने इस पापाचार के कारण अपना समस्त वैभव -राज्य गवाना पड़ा .इस दण्ड को यदि वर्तमान परिपेक्ष्य में लागू किया जाये तो बलात्कारी के साथ उसके परिवारीजन को भी दण्डित किया जाना चाहिए और उसकी समस्त संपत्ति सरकार द्वारा जब्त कर ली जानी चाहिए .
                      'बलात्कारी शिरोमणि ' रावण का उल्लेख यहाँ न किया जाये यह तो संभव ही नहीं ..ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती जहाँ रावण द्वारा तिरस्कृत  किये  जाने पर प्रज्वलित अग्नि में समां गयी वही रावण द्वारा अपह्रत हुई देवताओं,नागों,राक्षसों.  असुरों ,मनुष्यों ,यक्षों और दानवों की कन्यायें व् स्त्रियाँ भय से त्रस्त एवं विह्वल हो उठी थी .ऐसे पापाचारी रावण द्वारा जब 'रम्भा'पर बलात्कार किया जाता है तब नलकूबर उसे भयंकर शाप देते हुए कहते हैं -
 'अकामा.....तदा ''  -श्लोक-५४,५५,५६ ,उत्तर कांड   षड्विंश : पृष्ठ -६७१]अर्थात -वे [नलकूबर ] बोले 'भद्रे  [रम्भा ] !तुम्हारी इच्छा न रहते हुए भी रावण ने तुम पर बल पूर्व्वक अत्याचार किया है .अत:वह आज से दूसरी किसी युवती से समागम नहीं कर सकेगा जो उसे चाहती न हो ' 
'यदि वह काम से पीड़ित होकर उसे न चाहने वाली युवती पर बलात्कार करेगा तो तत्काल उसके मस्तक के सात टुकड़े हो जायेंगे '' माता सीता के हरण का दुष्परिणाम तो रावण को अपने प्राण गवाकर ही भुगतना पड़ा था .
                     निश्चित रूप से यहाँ भी बलात्कारी को प्राणदंड की ही सजा दिए  जाने का निर्देश दिया गया है .

                           
                       'किष्किन्धा कांड 'के 'अष्टादश:'सर्ग में 'श्री राम 'स्वयं लोकाचार व् लोकविरुद्धआचरण हेतु पापी के वध को धर्मयुक्त ठहराते है . बाली द्वारा अपने वध पर रोष व्यक्त करने पर श्रीराम उसे उसके वध का कारण बताते हुए कहते हैं  -
[अस्य ........ ...पर्यवस्तिथ:-श्लोक १९,२४ ,पृष्ठ -६८८,८८९ ]''इस महामना सुग्रीव के जीते जी इसकी पत्नी रूमा का ,जो तुम्हारी पुत्रवधू के सामान है ,कामवश उपभोग करते हो ,अत: पापाचारी हो .वानर ! इस तरह तुम धर्म से भ्रष्ट हो स्व्च्छाचारी हो गए ............तुम्हारे इसी अपराध के कारण तुम्हे यह दंड दिया गया है .वानरराज जो लोकाचार से भ्रष्ट होकर लोकविरुद्ध आचरण करता है ,उसे रोकने या राह पर लेन के लिए मैं दंड के सिवा और कोई उपाय नहीं देखता .मैं उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूँ अथ मैं तुम्हारे पाप को क्षमा नहीं कर सकता जो पुरुष अपनी कन्या,बहिन अथवा .छोटे भाई की स्त्री के पास काम बुद्धि से जाता है ,उसका वध करना ही उसके लिए उपयुक्त दंड माना गया है ..........तुम धर्म से गिर गए हो ......हरीश्वर !हम लोग तो भरत की आज्ञा को ही प्रमाण मानकर धर्म मर्यादा   का उल्लंघन करने वाले तुम्हारे जैसे लोगों को दंड देने के लिए सदा उद्यत रहते हैं .''
                                                             स्पष्ट है कि हमारे मार्गदर्शक धार्मिक ग्रन्थ ''रामायण'' में बलात्कारियों के लिए नपुंसकता ,वध -जैसे कठोर दण्डों का विधान किया गया है .वर्तमान में बर्बरता कि सीमायें लाँघ चुके इस अपराध हेतु ऐसे ही कड़े दंड का प्रावधान शीघ्र किया जाना चाहिए .

[शोध ग्रन्थ-''श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण '' गीता प्रेस ,संवत-२०६३ इकतीसवां पुनर्मुद्रण ]

                                         डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन '