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रविवार, 7 अप्रैल 2013

न्याय के लिए साथ आये

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ACID ATTACK IN KANDHLA[SHAMLI]

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Justice for Acid Victims in Kandhla Shamli

न्याय के लिए साथ आये




चुप नहीं रहना है अब पुरजोर आज चीख लो ,
साथ अपने लड़कियों तेजाब रखना सीख लो !

 मूक दर्शक बन के ये सारा समाज देखता ,
साथ देंगें ये नपुंसक ? मत दया की भीख लो !

 है नहीं कोई व्यवस्था  छोड़ दो बैसाखियाँ ,
अपनी सुरक्षा करने को मुट्ठियाँ अब भींच लो !

कमजोर हैं नाज़ुक हैं हम इन भ्रमों में मत रहो ,
काली तुम चंडी हो तुम पापी का रक्त चूस लो !

तुम डराओगे हमें ! हम भी डरा सकते तुम्हे ,
आर पार की ये रेखा हौसलों से खींच लो !

शिखा कौशिक 'नूतन'


THIS WAS THE FIRST ACID ATTACK IN KANDHLA [SHAMLI] ON GIRLS .ON 2ND APRIL 2013 FOUR SISTERS WERE RETURNING TO THEIR HOME AFTER A COLLEGE EXAM DUTY .TWO OR THREE BOYS HAVE THROWN ACID ON THEM .ONE SISTER WAS SERIOUSLY INJURED IN THIS ATTACK .SHE HAS BEEN ADMITTED IN SR.GANGA RAM HOSPITAL IN DELHI . AT THE SPOT SISTERS TRIED THEIR BEST TO CATCH THEM BUT THE CONVICTS GOT OFF .THE CONVICTS ARE STILL AT LARGE . THIS IS REALLY FRUSTRATING .LET US WAIT AND WATCH HOW WILL POLICE DEAL WITH THE ROGUES ? BUT ONE THING IS CLEAR WE OPPOSE THIS ATTACK  WITH ALL FORCE  .
    JAY HIND
DR.SHIKHA KAUSHIK

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

कुम्भकर्णी नींद से जागो -समाज-प्रशासन (तेजाबी हमला-शामली[कांधला] )

 

तेजाबी  हमलों  की  शिकार  बहनों का दर्द मात्र इतना नहीं कि वे तेजाबी हमलें का शिकार बनी .उनका दर्द मृत सामाजिक संवेदनाएं भी हैं .जब उन पर हमला किया गया वे एक कॉलेज की परीक्षा में ड्यूटी देकर घर लौट रही थी .दिन का समय था .वे तेजाब फैकने वालों से भिड़ी भी पर वे मार-पीट कर भागने में सफल रहे .वे सड़क पर पानी के लिए तड़पती रही और स्वयं रिक्शा कर अस्पताल गयी .आस पास के लोंगों  ने  कोई  मदद  नहीं की .यदि समाज की संवेदनाएं इतनी मृत नहीं होती तो शायद ऐसी घटना घटती ही नहीं .
    तेजाबी घटना की शिकार तीन  बहनों ने मीडिया के सामने अपने दुःख को प्रकट करते हुए कहा कि -''कोई हमारा साथ नहीं दे रहा है '' कडवी सच्चाई यही है हमारे समाज की कि लड़कियों पर- ताने कसे जाते हैं ,उनके साथ छेड़खानी की जाती है और जब इस सब से काम नहीं बनता तो तेजाबी हमले कर उन्हें सबक सिखाया जाता है और समाज मूक दर्शक बनकर सब कुछ देखता रहता है .
         आज अगर किशोर व् युवा तेजाबी इरादे लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं तो उसके लिए उनके परिवार वाले भी कम जिम्मेदार   नहीं है जो  ये  नहीं देखते  कि उनके नौनिहाल   किसकी   जिंदगी  बर्बाद  करते घूम रहे हैं .पूरा प्रशासन  भी सुप्त अवस्था में रहता है .एक बाइक  पर चार-से पांच लफंगें हूँ-हा-हा का शोर मचाते दिन भर सड़कों पर घूमते  रहते हैं   और उन पर किसी कि पाबन्दी नहीं -न घरवालों की और न प्रशासन की .लड़कियों के स्कूल-कॉलेज की छुट्टी का समय हो अथवा ट्यूशन पर जाने-लौटने  का समय , महिला शिक्षिकाओं के आने-जाने का समय चौराहों-गलियों में लफंगों की भीड़ इकट्ठा रहती है .न समाज इस ओर ध्यान दे रहा और न प्रशासन .
    इस एक तेजाबी घटना ने यदि समाज व् प्रशासन को कुम्भकर्णी  नींद से नहीं जगाया तो आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं के  फिर से  होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता .

     शिखा कौशिक 'नूतन'

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !


आज घर से  निकलते समय परसों हुई तेजाबी घटना की दहशत ने दिल को दहला दिया . मैंने आस-पास आज ज्यादा ध्यान दिया .कौन पास से गुजर  रहा है ? इस पर ध्यान स्वयं ही चला गया .हमारे कस्बे में हुई तेजाबी घटना ने इस धारणा  को तोड़ दिया कि हमारा क़स्बा इस तेजाबी आग से बचा हुआ है .तेजाबी हमले की शिकार बहने बहुत कर्मशील हैं और अपने परिवार के भरण-पोषण हेतु शिक्षिका का कार्य कर रही हैं .सात वर्ष पूर्व पिता के निधन के बाद से अपनी माता जी के साथ जीवन की विषमताओं को झेलती हुई इन बहनों पर तेजाबी हमला करते समय क्या कायर हमलावरों के हाथ नहीं कांपे ?किस माँ की कोख से पैदा होते हैं ये हैवान जो न तो किसी की जिंदगी  का दर्द तो महसूस कर सकते नहीं बल्कि घर से काम के लिए निकली लड़कियों की राह का रोड़ा बन जाते हैं .किन बहनों के होते हैं ये भाई  जो अपनी बहन   की ओर  उठी  नज़र  को तो फोड़ डालना चाहते  हैं पर गैर  लड़की  को सबक  सिखाने  के लिए तेजाब  से झुलसा  डालते  हैं उसकी  जिंदगी .निश्चित रूप  से अब  बेटियों   को बहुत सतर्क रहना होगा .बार बार मेरा ह्रदय उस माँ के दिल के दर्द का अंदाज़ा लगाकर रो पड़ता है जो घर से बाहर जाती बेटियों को लाखों हिदायते देकर भेजती है और जब बेटियां उन सब का पालन करने पर भी वहशियों का निशाना बनें तो माँ किस तरह अपने दिल को समझाए ! -

हवाएं शहर की अब महफूज़ नहीं हैं ,
रख दिया कलेजा माँ का चीरकर ,
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !

घूमते हैं शख्स कई तेजाब लिए हाथ ,
तुमसे उलझ जायेंगे ये जान-बूझकर , 
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !

 बेटे नहीं किसी के न भाई किसी के ,
ये पले शैतान की गोद खेलकर ,
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !

 ज़िस्म है इन्सान का हैवान की है रूह ,
काँपती इंसानियत इनके गुनाह सुनकर ,
 बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !

 किस जगह मिल जाएँ कोई न ठिकाना ,
हर कदम बढ़ाना ज़रा दिल को थाम कर ,
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !

 मुंह अपना छिपाते मनहूस हमलावर ,
पहचाने कैसे कौन भागे तेजाब फेंककर ,
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !

 आँहे,  आंसू ,चीखें ,  दर्द बाँटते हैं ये ,
आता मज़ा इनको है खुनी खेल खेलकर ,
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !

हिफाज़त न छोड़ना मुकद्दर के भरोसे ,
ये घूमते हैं अपना ईमान बेचकर ,
बेटियों घर से निकलना देख-भाल कर !

हे ईश्वर !पीड़ित परिवार  को इस सदमे से उबरने की शक्ति प्रदान कर और ऐसे वहशियों को फांसी  पर लटकाने
का रास्ता साफ कर !

      शिखा कौशिक 'नूतन'