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गुरुवार, 3 नवंबर 2011

जनता आखिर कब तक देखेगी ऐसे युवाओं की हत्या ?


जनता आखिर कब तक देखेगी  ऐसे युवाओं की हत्या ?


                                         लड़कियों को बचाने में गई इनकी जान1
                                             [कीनन व् रयूबेन की बहादुरी को शत-शत नमन ]
मुंबई में दो युवाओं की  गोली मारकर खुलेआम भीड़ के सामने हत्या कर दी गयी .कारण - वे क्लब में एक शराबी द्वारा लड़कियों से की जा रही छेड़कानी  का विरोध कर रहे थे .कीनन व् रयूबेन ने वही किया जो एक सभ्य नागरिक का कर्तव्य था.पुरस्कार  स्वरूप   उन दोनों को  मिली   मौत सारी जनता के सामने . ऐसा क्यों होता है कि आम जनता के सामने ऐसे अपराध होते हैं और वो निष्क्रिय  बनी रहती है .भीड़ मिल कर ऐसे हत्यारों को वही मौत के घाट उतार सकती है पर ....ऐसा नहीं होता .'' बस'' हो अथवा अन्य कोई सार्वजानिक स्थान लड़कियों के साथ खुलेआम बदतमीजी की जाती है पर उपस्थित जनता ''हम किसी और के मामले में क्यों पड़े ?'' सोचकर ऐसे अपराधों  को मौन स्वीकृति दे देते हैं .जनता मिल कर ऐसे अपराधों पर निर्णायक रोक लगा सकती है पर पहल तो हमें खुद से ही करनी होगी न !वरना हमारी आँखों के सामने कीनन व् रयूबेन जैसे युवाओं को ऐसे अपराधी मौत की नींद सुलाते रहेंगे .
                                                         शिखा कौशिक 

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

एक बेटी का परम्परा के मुंह पर करारा तमाचा


 एक बेटी  का  परम्परा   के  मुंह  पर करारा  तमाचा 
हमारे  समाज  में  सदियों  से वंश  चलाने  व्  अंत्येष्टि  संस्कार  के  नाम  पर  पुत्रों  के जन्म  पर  हर्ष  व्  उत्साह  प्रदर्शित  करने  की  परम्परा  रही  है  .पुत्र -उत्पत्ति  की इच्छा  के पीछे  हमारे  मान्य  ग्रंथों   में  पुत्रों  को  ही  मुक्ति  दिलाने  वाला  ,वंश  चलाने  वाला  के रूप  में  वर्णित  किया  जाना  एक  बड़ा  कारण  रहा  है  .''श्रीमदवाल्मीकीय  रामायण   '' में  इस  सन्दर्भ  में  उल्लेख  आता  है -
''''पुत्र्नाम्नों नरकाद यस्मात  पितरं त्रायते  सुत   
                   तस्मात्  पुत्र इति प्रोक्त:  पितरं  म: पाति सर्वतः ''
[श्री मद वाल्मीकीय रामायण ,अयोध्या काण्ड   ,सप्ताधिक्   शततम: सर्ग:,पृष्ठ -४४७,गीता  प्रेस गोरखपुर ] 
          स्मृतिकारों द्वारा उल्लिखित सोलह संस्कारों में भी ''अंत्येष्टि क्रिया ' पुत्रादि के द्वारा किया  जाना विधानित किये जाने से भी कन्या  जन्म की तुलना   में पुत्र   जन्म हर्ष  का कारण बन  गया  .इस एक कारण ने भारतीय समाज की मानसिकता  कन्या  जन्म विरोधी  बना  डाली .पिण्ड दान ,मोक्ष,स्वर्ग की भ्रांत धारणाओं  ने कन्या  -जन्म को एक अभिशाप    बना  डाला किन्तु   18 अक्टूबर   2011 को एक बेटी ने इस परम्परा   के मुंह  पर करारा  तमाचा  लगा डाला .मेरठ के प्रभातनगर निवासी   श्री खेमराज  की मृत्यु  ने जहाँ  उसकी दो पुत्रियों व् पत्नी को अन्दर तक तोड़ डाला होगा वहीँ उसकी १५ वर्षीय बेटी 'पूजा 'ने  पचास आदमियों  के समूह के आगे सिर पर सफ़ेद कपडा बांधकर  - आगे-आगे चलकर  सारे  समाज का ध्यान   अपनी  और खीचा  कि '' देखो एक बेटी भी अपने पिता की अंतिम  क्रिया  हेतु  शमशान घाट तक जा  सकती है वहीँ सूरजकुंड  शमशान घाट पर अपने पिता को मुखाग्नि देकर ''पुत्री'' शब्द  को सार्थक  कर दिया '' यदि  पुत्र  नरक  से मुक्ति  दिला  सकता  है तो  'पुत्री' क्यों नहीं  ?
          इस सब  में 'पूजा' का साथ उसके पूरे मोहल्ले ने दिया  जो इस और सकारात्मक संकेत है की हमारे  पुरुष प्रधान  समाज की मानसिकता  में परिवर्तन  आ रहा है .पुरुष प्रधान  समाज की मजबूत दीवारों को हिला कर रख देने वाली ''पूजा '' जैसी बेटी  को मेरा  सलाम  है . का 
                                                        शिखा  कौशिक 
                                    [विचारों का चबूतरा ]

सोमवार, 15 अगस्त 2011

आखिर सलट वॉक की जरूरत आज क्यों पड़ रही है ?'

आखिर सलट वॉक की जरूरत आज क्यों पड़ रही है ?'


कई ब्लोग्स पर सलीम खान जी की यह प्रस्तुति देखी -
इस आलेख में उन्होंने यह सूचना दी कि आगामी २१ अगस्त को लखनऊ में सलट वॉक का आयोजन होगा .उन्होंने इसे लखनऊ की तहजीब पर प्रहार बताया  है .हिन्दुस्तानी  स्त्रियों पर यह निशाना साधा है कि हिन्दुस्तानी तहजीब में स्त्री को देवी का दर्जा प्राप्त है पर आज की कुछ सिरफिरी  युवतियां अपने को देवी की जगह सलट कहलाना ज्यादा पसंद कर रही हैं .उनका कहना है ये वे युवतियां हैं जिनकी रोटी बेशर्मी वाले  रास्ते  से होकर चल रही है.
                  चलिए आपकी  सब बातें सही हैं पर एक मुद्दा मैं देती हूँ आप जैसी विचारधारा वालों  को कि ''आखिर सलट वॉक की जरूरत आज क्यों पड़ रही है ?''अब यह तर्क  मत दीजियेगा कि''युवतियों में संस्कार नहीं रहे .''क्योंकि एक लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है ऐसी घटनाओं की जिसमे पशुबल संपन्न पुरुष ने सिर से पैर तक ढकी स्त्री को अपनी वासना का शिकार बना डाला .सलट वॉक में शामिल होने वाली युवतियों के प्रति अपमानजनक टिप्पणी करना उसी आदिम सोच को प्रकट करता है जो स्त्री के तन-मन पर अपना अधिकार बनाये रखना चाहती है क्योकि उसके विचार में स्त्री को उन्ही चौखटों के भीतर रहना चाहिए जो स्वामी पुरुष ने उसके लिए निर्धारित की हैं . 

                            स्त्री के साथ हुए अत्याचार हेतु स्त्री को दोषी कहने वाली
सोच को ऐसी ही सलट वॉक आइना दिखा सकती हैं.हमारी तहजीब हमारे विचारों से झलकती है.दिल्ली की उमंग द्वारा आयोजित सलट वॉक जैसी सफलता लखनऊ में भी दोहराई जाये ऐसी मेरी शुभकामना है .


[सलट वॉक क्या  है -इसे रचना जी  ने  टिप्पणी रूप  में स्पष्ट कर दिया है.आप भी  जानें -
''slut walk एक समाचार या एक क्रांति समाचार था की टोरंटो कनाडा में एक पुलिस अधिकारी ने कहा था महिला को अगर सुरक्षित रहना हैं तो slut की तरह कपडे ना पहना करे । इस पर वहां की महिला ने आपत्ति दर्ज कराने के लिये वाल्क यानी मार्च किया जिसमे उन्होने हर तरीका कपड़ा पहना और कुछ बहुत ही कम कपड़ो में भी रही

रविवार, 8 मई 2011

'ब्लोगर सम्मान परम्परा का ढकोसला बंद कीजिये !''

'ब्लोगर सम्मान परम्परा का ढकोसला  बंद कीजिये !''
इस आलेख का जन्म वर्तमान में ब्लोगिंग जगत में चल रही ''ब्लोगर सम्मान समारोह परम्परा 'के प्रति मेरे मस्तिष्क में चल रही उधेड़-बुन से हुआ .सम्मान पाना सभी चाहते हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है किन्तु ब्लॉग-जगत में जो भी सम्मान प्रदान किये गए उनका आधार क्या है ?इसकी कोई ठोस जानकारी तथाकथित सम्मान सम्मलेन आयोजित करने वालों ने अंतर्जाल पर नहीं डाली.आखिर क्या हैं ये आधार -

१-क्या किसी ब्लॉग के समर्थकों के आधार पर उसे सर्वश्रेठ ब्लोगर चुना जाता है ?

२-क्या ब्लॉग पर आने वाली टिप्पन्नियों की संख्या के आधार पर सर्वश्रेठ ब्लोगर का चुनाव होता है ?

३-आप किन ब्लोग्स को किस आधार पर सम्मान प्रदान करने हेतु विश्लेषण के लिए चुनते हैं?

४-नन्हे ब्लोगर का चयन किस आधार पर करते हैं जबकि सभी जानते हैं की नन्हे ब्लोगर स्वयं ब्लोग्स पर पोस्ट नहीं डालते उनके माता-पिता ही ये काम करते हैं ?

५-किसी बलोगर की टिपण्णी और ब्लोगर्स से श्रेठ है इसका क्या आधार है ?

६-ऐसा क्या खास है सम्मान पाने वाले ब्लोगर में जो उसे अन्य ब्लोगर से श्रेष्ठ  बनता है ?क्या उसकी लेखन क्षमता अन्य ब्लोगर्स से श्रेष्ठ है ?

७-ब्लोग्स को  किन किन kश्रेणियों  में बांटा गया -राजनैतिक,सामाजिक ,अथवा-साहित्यिक  विधा के आधार पर पर-कविता,कहानी,लघु कथा,आलेख आदि ?

                                    हो सकता है मेरा ज्ञान कम हो किन्तु मैंने सम्मान प्राप्त करने वालों की सोची तो देखी,फोटो भी देखे पर सम्मान किस आधार पर प्रदान किये गए इस सम्बन्ध में एक भी पोस्ट सम्मान आयोजित करने वालों की और से अंतर्जाल पर डाली गए हो मैंने नहीं पढ़ी  . 
                                   इस परम्परा में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है .अभी से ही ब्लॉग जगत दो धडों में टूटता नज़र आ रहा है .मेरी समझ में नहीं आता की आखिर सम्मान की जरूरत क्या है ?मैं तो जिस भी ब्लॉग पर जाती हूँ मुझे तो ख़ुशी होती है की यहाँ पर भी एक नया ब्लोगर अपनी समस्त दुनिया को अपनी नज़र से हमारे समक्ष रख रहा है .सम्मान तो सभी के विचारों का किया जाना चाहिए .ये क्या की इसके विचार उससे बेहतर है ?
                                    इस सन्दर्भ में ''ब्लोगर मीट ''बहुत उपयोगी हो सकती हैं .ये समाज व् राष्ट्र की समस्याओं को सुलझाने की दिशा में सार्थक पहल कर सकती हैं .हर ब्लोगर का सम्मान कीजिये-सम्मान समारोह द्वारा नहीं उसका उत्साहवर्धन करके .उसकी सोच को सराह्कर.
                               ''ये ब्लोगर बेस्ट है ''कहने से ही तो सम्मान नहीं होता ये परम्परा ब्लोगर्स के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के स्थान पर कटुता की खाई ही चौड़ी करेगी .ब्लोगिंग की बगिया को फूलों से महकने दे नफरत के कांटे निकाल फेकिये .सम्मान परम्परा सभी ब्लोगर आपस में एक दूजे के ब्लोग्स पर सार्थक व् सटीक टिपण्णी देकर निभा ही रहे हैं.सभी बेस्ट ब्लोगर हैं .सभी अच्छा लिख रहे हैं ,सभी अच्छी टिपण्णी कर रहे हैं ,सभी लघु कथाएं सार्थक मुद्दे उठा रही हैं .सभी कवितायेँ दिल को छू रही हैं और .....सभी का सम्मान हमारे ह्रदय में समान रूप से है .आगे जब भी कोई सम्मान समारोह हो आप उसका बहिष्कार करें.सम्मान प्राप्त करने के स्थान पर सभी को सम्मान देने की वकालत करें ऐसा मेरा आपसे अनुरोध है .क्या आप मुझसे सहमत नहीं ?
                                                    शिखा कौशिक 

गुरुवार, 5 मई 2011

बस यही फ़र्क होता है !

कुछ दिन पहले भारत में एक महान संत ''सत्य साईं बाबा'' के महानिर्वाण से सारी भारतीय जनता का मन उनके प्रति श्रद्धा से भर गया और आँखें नम हो गयी उनसे बिछड़कर .आखिर क्यों ?केवल इसलिए क्योंकि वे प्रेम का सन्देश देते थे .हर गरीब-अमीर को समान रूप से अपने आशीर्वाद से नवाजते थे .लाखों-करोड़ों के ह्रदय सिंघासन  पर विराजमान कोई ऐसे ही नहीं हो जाता .ऐसी विभूति से बिछड़ना एक त्रासदी ही होती है .अब दूसरी  और द्रष्टि डालिए -अमेरिका में ९/११ की आतंकी घटना में अपनों को खो चुके लोग सड़कों पर निकल आये क्योंकि इस अमानवीय घटना को अंजाम देने वाला ''मानवता ''को कलंकित करने वाला ''ओसामा ''अमेरिकी ख़ुफ़िया  एजेंसी द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया था .निश्चित तौर पर अपनों को आतंकी घटनाओं में खोने वालों की आँखों में अब भी आंसू आये होंगे पर ख़ुशी के और एक सवाल भी जहन में उठा होगा -''ओसामा तुम्हे क्या मिल गया हमारी खुशियों में आग लगाकर ?'' यही अंतर है मानवता के प्रति समर्पित साईं बाबा जैसे महान मानव और मानवता को डसने वाले ओसामा जैसे नागों के संसार से विदा होने पर हमारे भावों में .प्रेम और नफरत में ,पाप और पुण्य में ,मानव और राक्षस में .साईं बाबा हमारे मन में सदैव विराजते रहेंगे और प्रेम की ज्योति जगाते रहेंगे .ओसामा के प्रति बस यही  जुबाँ से निकलेगा 'तुम्हारा अंत हो गया अब मानवता सुकून की साँस ले सकेगी .''
                                                        साभार गूगल 

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

लड़कियां जब चौखट से बाहर आती हैं !

आजकल हर ओर ''औनर किलिंग '' के नाम पर लड़कियों को मौत के घाट उतारा जा रहा है .मेरा मानना है कि ये ''हॉरर किलिंग '' हैं .15 से २० साल की युवतियों को परिवार की मर्यादा के नाम पर मौत के घाट उतारना अमानवीय कृत्य तो है ही साथ ही यह आज की प्रगतिशील नारी शक्ति को ठेंगा दिखाना भी है जबकि अधिकांश  लड़कियां अपने परिवार का नाम ऊँचा कर रही हैं .ऐसे में इज्जत के नाम पर उनका क़त्ल न करके बहुत सोच विचार के बाद परिवार को कोई निर्णय लेना चाहिए .लड़कियां चौखट से बाहर आकर कैसे हर कसौटी पर खरी उतरती हैं इन्हें मैंने इन शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया है -

लड़कियां जब चौखट से 
बाहर आती हैं 
उनके साथ पग-पग चलती 
है कुल की मर्यादा 
पिता का स्वाभिमान 
माता का विश्वास 
भाई की हिदायतें 
और अनंत स्वप्नों 
की श्रृंखला  ,
लड़कियां हर कसौटी
पर खरी उतर जाती हैं 
लड़कियां जब चौखट से 
बाहर आती हैं .

वो धैर्य  से ,सहनशीलता से 
पार करती हैं हर बाधा ,
छीन लेती हैं इस जग से 
लूटा गया अपना हक आधा ,
आधी दुनिया  की बुझी 
आस फिर जग जाती है .
लड़कियां जब चौखट से 
बाहर आती हैं .

सदियों से सुप्त मेधा को 
झंकझोर कर जगाती हैं ,
चहुँ ओर अपनी प्रतिभा का 
लोहा मनवाती हैं ,
बछेंद्री बन एवरेस्ट पर 
चढ़ जाती हैं ,कल्पना रूप 
में ब्रह्माण्ड घूम आती हैं .
लड़कियां जब चौखट 
से बाहर आती हैं .

''हॉरर किलिंग'' करने वालों को अपने गिरेबान में भी झांक कर   देख लेना चाहिए कि आखिर घर का बच्चा ऐसा करने के लिए क्यों विवश हो जाता है .वो क्यों बाहर के व्यक्ति पर  विश्वास कर घरवालों से बगावत कर देता है ?क्यों घर से भागने को विवश होता है ? कहीं न कहीं कमी उन में ही है जो मर्यादा का नाम लेकर अपने मासूम बच्चों  का  खून  बहा रहें हैं .

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

क्या लड़कियां तनु जैसी होती हैं

मेरे एक परिचित हैं .कुछ दिन पूर्व उन्होंने मुझसे पूछा कि ''तनु वेड्स मनु ''फिल्म कैसी लगी ? अब मैं क्या कहती !फिल्म में तनु का किरदार जिस सोच के साथ रचा गया है वो मेरे सिर के ऊपर से निकल गया .मैंने तुरंत कह दिया ''तनु का किरदार अच्छा नहीं लगा .लड़कियां ऐसी नहीं होती .''जवाब में  वे काफी जोर देकर बोले ''लड़कियां ऐसी ही तो होती हैं .'' मैं उनसे बिलकुल सहमत नहीं हूँ . फिल्म में तनु  को केवल रोमांच के लिए किसी के साथ भी भागने को तत्पर दिखाया गया है .सिगरेट पीना,सहेली की शादी में उन्मादी बन शराब पीना और भी न जाने   कितनी बेतुकी बातों से भरी है फिल्म और तनु का किरदार .मेरा मानना है कि लडकिया बहुत जिम्मेदारी के साथ अपने परिवार व् कुल के मान -सम्मान की रक्षा करती हैं .अपना स्वार्थ उन पर कभी हावी नहीं होता .लता मंगेशकर जी हमारे समक्ष आदर्श हैं .बहुत छोटी उम्र में पिता को खो देने के पश्चात् उन्होंने अपने परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की और कभी अपने सिद्धांतों   के साथ समझौता नहीं किया .यह भी सही है की जो युवती स्वयं सिगरेट अथवा अन्य नशा करती है वह अपनी संतान को क्या संस्कार देगी ?भारतीय संस्कृति में तनु जैसा किरदार कोई मायने नहीं रखता और इस किरदार के आधार पर सब लड़कियों का विश्लेषण और भी बड़ी मूर्खता है . आप क्या सोचते हैं जरूर बताएं .