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रविवार, 29 जुलाई 2012

टीम अन्ना दिल साफ करो तब कॉग्रेस का इंसाफ करो !

टीम अन्ना दिल साफ करो तब कॉग्रेस का इंसाफ करो ! 
Rajiv Gandhi's 20th death anniversary
पिछले वर्ष एक काम के सिलसिले में २० अगस्त २०११ को मेरठ जाना हुआ .यही वह समय था जब दिल्ली में जनलोकपाल बिल को लेकर अन्ना का आन्दोलन पूरे शबाब पर था .एक सरकारी कार्यालय में बैठे हुए बार बार ''भारत माता की जय '' और ''वन्देमातरम '' का उद्घोष कानों में अमृत घोल रहा था .वहां से बाहर आये तो देखा कई वाहनों पर प्यारा तिरंगा लगाया गया था .मन उमंगित हो उठा .ये सब  अन्ना आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे .ह्रदय में एक आस बंधी कि ''भारत में भी भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर पूरा भारत एक साथ खड़ा हो  सकता है ......पर यह ख़ुशी ज्यादा  देर तक नहीं टिक  पाई क्योंकि हम जैसे ही व्यस्त सड़क पर पहुंचे इस अन्ना समर्थित रैली के कारण जाम में फँस गए . दुःख जाम में फँसने का नहीं था दुःख इस बात का था कि अब 'भारत माता की जय' और 'वन्देमातरम' के  उद्घोष का स्थान राजनैतिक रंग में रंगे नारों ने ले लिया था .उत्साही युवा चिल्ला रहे थे -''सोनिया जिसकी मम्मी है ...वो सरकार निकम्मी है .''मन में आया क्यों लक्ष्य से भटक जाते हैं हम .ये आन्दोलन क्यों दिशाहीन हो रहा है ?सोनिया जी ही को क्यों निशाना बनाया जा रहा है .''मायावती जी जिस सरकार की मम्मी हैं ''या  ''जयललिता जी जिस सरकार की मम्मी हैं ''क्या वो सरकार निक्कमी नहीं ?मम्मी को छोडो ये ''पापा लोग ''की सरकार ''कर्नाटक ''में क्या कर रही है ?
                          इस तमाशे को देखकर यह समझने में मुझे देर न लगी कि यह आन्दोलन कुछ अति बुद्धिशाली व् स्वार्थी व्यक्तियों की भेंट चढ़ने वाला है . जिस आन्दोलन के  कर्ता-धर्ता स्वयं आन्दोलन के मुख्य लक्ष्य से भटक गए हो उस आन्दोलन को दिशाहीन होने से कोई नहीं रोक सकता .भ्रष्टाचार की समस्या सभी राजनैतिक दलों से लेकर नौकरशाही ,प्रशासनिक संस्थाओं और जनता से भी जुडी है .कोई भी ईमानदार कहलाने लायक  नहीं है .हम स्वयं अपने काम को शीघ्र अति शीघ्र करवाने हेतु भ्रष्टाचार को पाल-पोस रहे हैं . भ्रष्टाचार का ठीकरा  केवल  एक  राजनैतिक पार्टी ''कौंग्रेस'' पर फोड़ने  का प्रयास  कर  अन्ना  टीम आन्दोलन ने समस्त आन्दोलन को राजनैतिक रंग में रंग दिया .बात बात पर जनता द्वारा चुनी हुई कॉग्रेस की सरकार पर हमला बोलकर अन्ना टीम अपनी विश्वसनीयता को खो दिया .आज ये केवल लकीर पीटने का काम कर रहे हैं .  टीम अन्ना ने पूरे भारत में केवल एक कुत्सित सन्देश प्रसारित करने का का विफल प्रयास किया कि-''भ्रष्टाचार के लिए केवल कॉंग्रेस दोषी है और वह जनलोकपाल  बिल पास नहीं होने देती . ''इस दौरान  होने वाले  कई  राज्यों  के चुनाव  में भी अन्ना टीम केवल कॉग्रेस के उम्मीदवारों  की खिलाफत करती रही .उसने अन्य दलों के खिलाफ क्यों नहीं कुछ कहा ? यह आन्दोलन ''जन लोकपाल  बिल को पास कराने के स्थान पर ''कॉग्रेस को हटाओ आन्दोलन ''बन कर रह गया .अपने अति स्वार्थवाद में अन्ना टीम यह भी भूल गयी  ''कि कॉग्रेस को जनता ने ही चुनकर भेजा है सरकार  बनाने हेतु .''यह आन्दोलन ''जन लोकपाल  बिल को पास कराने के स्थान पर ''कॉग्रेस को हटाओ आन्दोलन ''बन कर रह गया .अपने अति स्वार्थवाद में अन्ना टीम यह भी भूल गयी  ''कि कॉग्रेस को जनता ने ही चुनकर भेजा है सरकार  बनाने हेतु .''
जनता ने भी महसूस किया ''कि -अन्ना टीम तो लोकपाल के बहाने वही काम कर रही है जो कॉग्रेस की विपक्षी पार्टियाँ कॉग्रेस को बदनाम करने के लिए करती रहती हैं .''इस  तथ्य के उजागर होते ही अन्ना आन्दोलन की रीढ़ टूट गयी अर्थात आम जनता ने इस  आन्दोलन से दूरी बना  ली .आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे अन्ना ने अपने कई बयानों द्वारा यह साबित कर दिया कि वे संघी  मानसिकता के हैं और श्री शरद पंवार के एक युवक द्वारा तमाचा मारे जाने पर अन्ना के बयान ''बस एक ही ''ने उनके गाँधीवादी होने पर भी बड़ा सा प्रश्न चिह्न लगा दिया .यदि अन्ना टीम अपनी निजी भावनाओं को इस आन्दोलन से दूर रखती तो आज यह आन्दोलन इस तरह भीड़ के लिए न तरसता  .अन्ना टीम को अब पहले  अपना दिल साफ़ कर लेना चाहिए तब देश सेवा को समर्पित कॉग्रेस पार्टी पर कोई आरोप लगाने की हिम्मत करनी चाहिए .
                                           जय हिंद ! जय भारत !
                           शिखा कौशिक  

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

क्यों न ''भारत रत्न'' चुनने का अधिकार भी भारतीय जनता को प्रदान किया जाये ?

क्यों न ''भारत रत्न'' चुनने का अधिकार भी भारतीय जनता को प्रदान किया जाये ?



sushma.jpgभूपेनदा (भूपेन हजारिका) भारत के महान सपूत थे। मैं प्रधानमंत्री से निवेदन करूंगी कि उन्हें भारत रत्न से नवाजा जाए।-श्रीमती सुषमा स्वराज [twitter -९/11/11]
                    
              
क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने की मुहीम कुछ माह पहले काफी जोर पकड़ रही  थी  .हमारे कुछ ब्लोगर्स ने उनके पक्ष-विपक्ष में सराहनीय पोस्ट भी लिखी थी .कल सुषमा जी ने ''भूपेन दा'' को 'भारत रत्न' दिए जाने की मांग ट्विटर पर उठाकर एक नया मुद्दा सोच-विचार हेतु हम सब के समक्ष रख दिया है .बहुत समय से हमारे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जी को भी 'भारत रत्न दिए जाने का मुद्दा उठाया जाता रहा है .
                           यदि पूर्व में घटी घटनाओं पर एक नजर डालें तो यह तथ्य भी प्रकट होता है कि इस पुरस्कार के निर्धारण में राजनीति भी खेली जाती है .हमारे महान स्वतंत्रता सेनानी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के परिजनों ने ''बहुत देर से यह सम्मान '' नेता जी को दिए जाने पर वापस लौटा दिया था . ऐसे में जब भी कोई  इस सम्मान को किसी व्यक्ति विशेष को दिए जाने की मांग उठाता है तब दूसरा पक्ष किसी दूसरे को दिए जाने की वकालत करता है .राजनैतिक पार्टियाँ तो अक्सर  इसमें भी अपना हित तलाशने लगती हैं .
                  एक विचार मस्तिष्क में आया है जिसे आप सभी से साझा करना चाहती हूँ क्यों न ''भारत रत्न'' चुनने का अधिकार भी भारतीय जनता को प्रदान किया जाये ?सरकार किसी वर्ष विशेष में ''भारत रत्न '' के लिए दस नामों को चुने और हमें यह अधिकार दिया जाये कि हम उनमें से किसी एक को उस वर्ष के लिए ''भारत रत्न '' चुने .ऐसी प्रक्रिया से इस सर्वोच्च  सम्मान की गरिमा बची  रहेगी और हमारे लोकतान्त्रिक देश की प्रतिष्ठा  में चार चाँद लग जायेंगें .आपका क्या विचार है?
                                                 शिखा कौशिक 



शनिवार, 13 अगस्त 2011

एक बिटिया का दृढ़-निश्चय !

एक बिटिया का दृढ़-निश्चय !
[६५७-माधुरी ]

इससे अच्छी खबर और क्या होगी कि एक बेटी अपनी माँ के अधूरे सपने को पूरा करने का दृढ़ निश्चय करे .''अमर उजाला ''दैनिक के ७अगस्त २०११ के अंक में पृष्ठ  -17  पर छपी खबर ''माँ का सपना बेटी करेगी  पूरा '' ने एकाएक ही अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर लिया .बुसान एशियन  गेम्स  की ८०० मी. दौड़  में रजत  पदक जीतने वाली अर्जुन  अवार्डी ' माधुरी 'ने लखनऊ में आयोजित 600 मी . की दौड़ में स्वर्ण पदक
जीतने वाली अपनी बेटी को जैसे  ही विक्ट्री  स्टैंड पर गोल्ड मैडल दिया सारा  स्टेडियम करतल ध्वनि की गडगडाहट से गूंज उठा .तेरह वर्षीय बिटिया ''हरमिलन '' ने यह कहकर सबका दिल जीत लिया कि ''मम्मी का ओलम्पिक में खेल पाने का सपना अब मैं पूरा करूंगी ''यह सुनकर माधुरी ने तो बिटिया को गले से ही लगा लिया .''भारतीय नारी '' ब्लॉग परिवार की ओर से मैं प्रभु से प्रार्थना करूंगी कि ''इस बिटिया के दृढ निश्चय को वे  अवश्य पूरा करें ''
                    माधुरी व् हरमिलन दोनों को बहुत बहुत शुभकामनाएं  .

                                                    शिखा कौशिक 
                                

सोमवार, 1 अगस्त 2011

उमंग ने भरी उमंग !




१९ वर्षीय  छात्रा उमंग सब्बरवाल ने भारत में सल्ट वॉक  का सफलता पूर्वक आयोजन कर भारतीय पुरुष समाज को चुनौती  दी है .प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय ने लिखा है कि ''अधूरा देखना अश्लील है ''इसी पंक्ति को यथार्थ में एक आन्दोलन का रूप दे उमंग ने यह बात उठाई कि छेड़कानी  व् बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए लड़कियों द्वारा धारण की गयी वेशभूषा जिम्मेदार नहीं है बल्कि पुरुष की स्त्री को एक उपभोग की वस्तु मानने वाली मानसिकता इसके लिए जिम्मेदार है .बड़ी संख्या में युवाओं ने इस आयोजन में हिस्सा लेकर एक आशा जगाई है .स्त्री को सम्मान देना -हमारी संस्कृति की परंपरा रही है .उम्मीद कर सकते हैं कि पुरुष अपनी सोच में बदलाव लाने का सार्थक प्रयास करेंगे .उमंग को इस सफल आयोजन पर हार्दिक शुभकामनायें .
           शिखा कौशिक

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

यह सम्मान है या अपमान ?

यह सम्मान  है या अपमान ?

इसे महारानी  लक्ष्मीबाई का  सम्मान  कहें  या  अपमान ?यह हमारी भावनाओं के साथ एक खिलवाड़  जैसा है .अमेरिका की प्रतिष्ठित  टाइम पत्रिका ने हाल ही में पति के बचाव में दीवार बनकर खड़ी होने वाली दुनिया की जाबांज पत्नियों की एक सूची जारी की जिसमे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को आठवां स्थान दिया गया है  .कई समाचार पत्रों ने इसे बहुत बड़ी उपलब्धि माना   पर जरा ध्यान दीजिये उनसे ऊपर किस किस को स्थान दे दिया गया है  -
*इलेनोर रूजवेल्ट -[पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की पत्नी ] को ''प्रथम स्थान''
 उपलब्धि -नस्लवाद,गरीबी व् लिंगभेद पर खुलकर अपनी बात रखी .

*जुने कार्टर फिश -कार्टर परिवार से सम्बन्ध.अच्छी गायिका ,डांसर ,गीतकार ,अभिनेत्री और लेखक .इन्हें तीसरा स्थान दिया गया .

*साराह पालिन -सबसे कम उम्र की महिला जो  अलास्का की गवर्नर बनी .इन्हें पांचवां स्थान दिया गया .

*इलेन दी.गेनेरेस -छठवां स्थान -खुले तौर पर माना कि ये एक समलैंगिक हैं .आस्ट्रेलिया की अभिनेत्री .

*सातवाँ स्थान दिया गया है -मिशेल ओबामा को जो वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति की पत्नी हैं .फैशन आइकोन व् रोल मॉडल ke  रूप में उभरी हैं

          इन सब से नीचे आठवां स्थान हमारी रानी लक्ष्मीबाई  को दिया गया है .टाइम पत्रिका  ने यह जानकारी नहीं दी है कि सूची किस आधार पर बनाई गयी है ? ऐसी  सूचियाँ  बनाना  और  उसमे  अतार्किक  रूप से हमारे आदर्श चरित्रों को नीचे  स्थान देना  पत्रिका ke  लेखक मंडल ke  दिमागी  दिवालियापन  को तो जाहिर करता ही है साथ ही हमारे दिल  को भी चोट  पहुंचाता है .झांसी  की रानी ke  महान  साहस की तुलना किसी से भी करना असंभव  है फिर  इस सूची में जो नाम उनसे ऊपर दिए गए हैं वे तो तुलनात्मक रूप से कहीं ठहरते  ही नहीं .भारत सरकार को इस सम्बन्ध में उचित कदम उठाने चाहिए ताकि आगे से किसी भी देश की कोई भी पत्रिका हमारे आदर्श चरित्रों को अपनी सूची में शामिल करते  समय उचित स्थान दें .
                  शिखा कौशिक
[भारतीय नारी ब्लॉग से जुड़ें ]


रविवार, 24 जुलाई 2011

प्रथम पुरुष स्त्रीवादी :आदिकवि वाल्मीकि

प्रथम पुरुष स्त्रीवादी :आदिकवि वाल्मीकि

भूतल के प्रथम काव्य ''रामायण '' के रचनाकार श्री वाल्मीकि ने अपने इस वेदतुल्य आदिकाव्य ''रामायण'' द्वारा न केवल मर्यादा मूर्ति  श्री राम के चरित्र की रचना की बल्कि तत्कालीन समाज में स्त्री -जीवन की समस्याओं का यथार्थ चित्रण भी किया है .न केवल एक रचनाकार के रूप में वरन स्वयं ''रामायण'' के ''उत्तरकाण्ड '' के ''षणवतित्म: [९६ ] ''सर्ग में सीता की शुद्धता का समर्थन करते हुए-उन्होंने यह सिद्ध किया है कि वह सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में प्रथम पुरुष स्त्रीवादी थे .पश्चिम से नारीवाद की उत्पत्ति बतलाने वाले विद्वान भी यदि ''रामायण ''में महर्षि वाल्मीकि द्वारा चित्रित स्त्री जाति की समस्याओं ,स्त्री संघर्ष ,स्त्री -चेतना का अध्ययन करें तो निश्चित रूप से वे भी यह मानने के लिए बाध्य होंगे कि जितना प्राचीन विश्व का इतिहास है utna ही प्राचीन है -स्त्री जाति के संघर्ष का इतिहास -वह स्त्री चाहे देव योनि की हो अथवा राक्षस जाति की .
                 ''स्त्री जाति की हीन दशा ''वर्तमान में जितना बड़ा बहस का मुद्दा बन चुका है ,उसे उठाने का shery  महर्षि वाल्मीकि को ही जाता है .राजा दशरथ के पुत्र -प्राप्ति हेतु लालायित होने को महर्षि इस श्लोक के द्वारा उकेरते हैं -
    ''तस्य चैवंप्रभावस्य ............''[बालकाण्डे ;अष्टम:सर्ग:;
श्लोक-१]  अर्थात सम्पूर्ण धर्मो को जानने वाले महात्मा दशरथ ऐसे प्रभावशाली होते हुए भी पुत्रों के लिए सदा चिंतित रहते थे .उनके वंश को चलाने वाला कोई पुत्र नहीं था .]''

               स्त्री की हीन दशा का मुख्य कारक जहाँ यह था कि पुत्री को वंश चलाने वाला नहीं माना जाता था वही पुरुष-प्रधान समाज में कन्या का पिता hona भी अपमानजनक माना जाने लगा था .महर्षि वाल्मीकि भगवती सीता के मुख से इसी तथ्य को उद्घाटित करते हुए लिखते हैं-
          
     'सदृशाच्चापकृष्ताच्च ........''[अयोध्याकांडे अष्टादशाधिकशततम:
सर्ग: ,श्लोक -३५ ][अर्थात संसार में कन्या के पिता को ,वह भूतल पर इंद्र के तुल्य क्यों न हो ,वर पक्ष के लोंगों से ,वे समान या अपने से छोटी हैसियत के ही क्यों न हों ,प्राय: अपमान उठाना पड़ता है ]
                  
                          [शेष अगली पोस्ट में ]
              शिखा कौशिक 
   

शनिवार, 23 जुलाई 2011

रचना जी का शुक्रिया -नारी ब्लॉग से हटाने के लिए

रचना जी का शुक्रिया -नारी ब्लॉग से हटाने के लिए

दो दिन पूर्व मुझे ''नारी''ब्लॉग की व्यवस्थापिका सुश्री रचना जी का मेल प्राप्त हुआ .
''आप दोनों को नारी ब्लॉग की मान्य सदस्या माना हैं
आप दोनों को यहाँ सदस्य
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/07/against-dress-code-for-women.html

देख कर बहुत आश्चर्य हुआ और उस से भी ज्यादा दुःख हुआ की जो आदमी औरतो के ऊपर
निरंतर लिखता हैं और जिस को हर किसी ने ब्लैक लिस्ट कर रखा हैं आप उस से हाथ
मिलाये हैं और मेरे ऊपर आई वाहियात पोस्ट पर भी चुप हैं

आप का नज़रिया जानना चाहती हूँ
रचना
नारी ब्लॉग मोडरेटर''

इस मेल को पढ़कर  मैंने रचना जी के साथ चैट की जो इस प्रकार है -
रचना: namastey shikha ji
रचना: aap ko ek email bhajee thee
रचना: kyaa daekhnae kaa samay mila
मुझे: yes i have recieved this right now
रचना: ok
रचना: i think you have joined hand with a very wrong person who is
abusive about woman
रचना: he has been thrown out of hamarivnai
रचना: for his dirty post on woman
मुझे: i am on ''blog ki khabre ''and other anwar jamal ji 's blog only
to express my views .
रचना: why promote such a platform that abuses woman
रचना: because you people support him he writes on woman in dirty language and
रचना: goes scot free
रचना: any ways this to me simply means that dignity of your woman
friends mean very less for you
मुझे: he behaves with me as a brother .
रचना: that in the beg n he behaves with every one
रचना: but he is a offender
मुझे: if his thinking is not right i can try to advice him .o.k. have a nice day

अभी इस पोस्ट में लिंक जोड़ा है तो पता चला है कि-


''यह ब्लॉग मात्र आमंत्रित पाठकों के लिए है

http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/ लगता है आपको इस ब्लॉग को पढ़ने के लिए आमंत्रित नहीं किया गया है. अगर आपको लगता है कि कोई गलती हुई है, तो आप ब्लॉग के लेखक से संपर्क कर एक आमंत्रण के लिए अनुरोध कर सकते हैं.''अर्थात  अब मैं इसे देख भी नहीं सकती हूँ .
    मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगी  रचना जी से आप पूरे ब्लॉग जगत में नज़रे घुमाकर देखिये आप जैसा कोई नहीं .हरीश जी से अनवर जी की रोज किसी न किसी विषय पर मत भिन्नता  रहती है पर उन्होंने मुझ पर विश्वास कर मुझे अपने ब्लॉग ''ब्लॉग के समाचार ' का प्रधान संपादक तक बना डाला .आप ने अनवर जी की जितनी निंदा की है वो किसी न किसी आलेख को लक्षित कर की है पर मैं उनके व्यक्तित्व को महत्त्व देती हूँ .आलेख में व्यक्त विचारों से हो सकता हैं मैं भी सहमत न  हूँ  पर ''प्यारी माँ'' जैसे ब्लॉग को सृजित करने वाला व्यक्ति एक सभ्य व्यक्ति ही होगा .उसपर  उनकी  पोस्ट जो उनकी  बिटिया  से सम्बंधित  है उसपर  भी नज़र डाल लीजिये .मुझे अपने व् शालिनी जी के ''नारी ''ब्लॉग '' से हटाये जाने से कोई आपत्ति नहीं है .रचना जी का ब्लॉग है वे जो चाहे कर सकती हैं पर एक प्रश्न ह्रदय में उठता ही है कि क्या इस तरह वे ''नारी सशक्तिकरण '' को परिभाषित करती है कि ''किसी भी पुरुष पर स्त्री विरोधी होने का आरोप लगा दे और यह भी न जाने कि vo  निजी जीवन में कितना सम्मान करता है स्त्री जाति का ''.रचना जी का कई महीने पूर्व एक मेल शालिनी जी को   ''सलीम जी ''के सम्बन्ध में भी प्राप्त हुआ था कि ''इनकी पोस्ट  पर कमेन्ट न करें ये ठीक लोग नहीं है ''-ब्लॉग जगत में इस प्रकार की गतिविधियों से मैं व् शालिनी जी नितांत अनभिज्ञ  रहे हैं और कौन व्यक्ति क्या है -इस बारे में कम से कम रचना जी की बात पर तो विश्वास करना मुश्किल ही है . 
                      हो सकता है उन्होंने ''नारी''ब्लॉग पर अन्य योगदानकर्ताओं के बारे में भी जाँच कर ली हो यदि नहीं की है तो तुरंत कर लेनी चाहिए क्योंकि उनके ब्लॉग की कई अन्य सदस्य भी अनवर जी व् सलीम जी के ब्लोग्स पर न केवल योगदानकर्ता है बल्कि पदासीन भी हैं .
               मैं अपनी सभी नारी सम्बंधित रचनाओं के लिए एक नए ब्लॉग  ''भारतीय नारी ''का सृजन भी कर रही हूँ क्योंकि मुझे विश्वास है की अति नारी वादी रचना जी ने मेरी व् शालिनी जी की सभी रचनाये भी अपने ब्लॉग से हटा दी होंगी  .
             मैं पूनम पांडे जैसी नारियों का साथ कभी नहीं दे सकती की नारी अस्मिता    को तार   तार    कर वे जो चाहे नारी सशक्तिकरण    के आधार    पर पहने    अथवा     कुछ    भी न पहने   और न  ही अन्य नारीवादियों की तरह सूर्पनखा को महिमा मंडित करने के लिए श्री लक्ष्मण जी के उज्जवल चरित्र पर उंगली उठा सकती हूँ मात्र  इसलिए  की सूर्पनखा भी एक स्त्री थी  .मैं हमेशा माता सीता जैसे चरित्रों के साथ हूँ जिन्होंने स्त्री जाति को सम्मान दिलाया है और मर्यादा को कभी नहीं छोड़ा   .
          रचना जी का एक बार  और शुक्रिया   .

---------- Forwarded message ----------
From: रचना Rachna <indianwomanhasarrived@gmail.com>
Date: Thu Jul 21 05:08:00 PDT 2011
Subject: रचना Rachna के साथ चैट करें
To: shikhapkaushik@gmail.com
 

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

क्या कन्या भ्रूण हत्या करने वाले इससे लेंगे कुछ सबक !




क्या कन्या भ्रूण हत्या करने वाले इससे लेंगे कुछ  सबक ?कल मैंने अनवर जी के ''मुशायरा ' ब्लॉग पर उनके द्वारा प्रस्तुत एक अशआर पढ़ा ,जो इस प्रकार था -
 
तर्क ए मोहब्बत पर भी होगी उनकी  नदामत हम से ज़्यादा
किसने की हैं कौन करेगा उनसे मोहब्बत हम से  ज़्यादा
कोई तमन्ना कोई मसर्रत दिल के करीब आने ही ना दी 

किसने की है  इश्क़  में यारों 
ग़म से मोहब्बत हम से  ज़्यादा
इस अशआर के नीचे लिखी पंक्तियाँ मन को झंकझोर  देने वाली थी.जो इस प्रकार थी -''एक मासूम कली हमारे आँगन में खिली हमारे घर को महकाया और फिर जन्नत का फूल बन गयी .'' अनवर जी ने इस सन्दर्भ  में बताया कि-
''अशआर  के  नीचे  एक लाइन जिस वाक़ये से मुताल्लिक़ लिखा है, वह पिछले साल 22 जुलाई को पेश आया था। अब दो दिन बाद फिर 22 जुलाई आने वाली है। मैं अपनी बेटियों से प्यार करता हूं। अनम आज भी याद आती है तो आंखें भर आती हैं। वह इस संसार में कुल 28 दिन ज़िंदा रही। उसने बड़ी हिम्मत से ‘स्पाइना बिफ़िडा‘ के फ़ोड़े की तकलीफ़ को झेला और इतने बड़े ज़ख्म के बावजूद उसने हमें परेशान नहीं किया। वह तो रोती तक न थी। मैं अपने हाथों से सुबह शाम दो वक्त उसकी ड्रेसिंग किया करता था।
बहरहाल वह हमें याद आती है लेकिन उसके हक़ में यही बेहतर था।
हमारा रब हमें उससे फिर मिला देगा, इंशा अल्लाह 

अपनी नन्ही सी कली के प्रति उनकी भावनाओं ने दिल को छू लिया  .मैं परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करूंगी कि वो अनवर जी की  ख्वाहिश को जरूर पूरा करें व् सभी बच्चियों को अनवर जी जैसे पिता की छत्र-छाया प्रदान करें

                                            शिखा कौशिक 

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

''खिलाफ़त कर के भी देखो ''

''खिलाफ़त कर के भी देखो ''

१३ जुलाई २०११ की शाम को हुए तीन धमाकों ने मुंबई सहित पूरे देश को फिर से दहला डाला .मुम्बईकरो ने साहस के साथ इसका मुकाबला किया और घायलों को अस्पताल पहुँचाया .मुम्बईकरो ने हर आतंकी हमले व् बम-विस्फोट का इसी हौसले के साथ डटकर मुकाबला किया है पर ''१४ जुलाई २०११ के ''अमर उजाला ''दैनिक समाचार पत्र में पृष्ठ  -१४ ''पर प्रकाशित ''दिल में टीस;पर नहीं टूटा  मुंबई का हौसला ''खबर में उल्लिखित एक बात ने  मुझे सोचने पर विवश कर दिया .खबर में लिखा था कि-''मुंबई के लोगों की जिन्दगी फिर से पटरी पर लौट रही है .सुबह लोग अपने दफ्तर जाते दिखे.कबूतरखाना के सामने एक स्कूल में बच्चों के चेहरे पर दहशत का नामोनिशां तक नहीं था .बच्चों का कहना था कि उन्हें धमाकों के बारे में मालूम है लेकिन वे डरते नहीं हैं .''
                           यही बात सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर इतनी शीघ्र मुंबई सामान्य कैसे हो गयी ?क्या बम-विस्फोंटों को उसने अपनी नियति समझ लिया है ?२० से ज्यादा हमारे जैसे  इंसानों के जिस्म के टुकड़े-टुकड़े हो गए .ठीक है हम दहशतगर्दों को ये जवाब देना चाहते हैं कि हम तुम्हारे हमलों से डरते नहीं हैं पर हम अगर एक सामान्य इन्सान है तो ऐसे मौके पर हमारे भीतर डर और आक्रोश दोनों ही प्रकट होने चाहियें .
                          मुंबई हमलों  के अगले दिन अपने दैनिक कार्यों पर न जाकर बम-विस्फोटों का अपने स्तर से शांतिपूर्ण विरोध करना चाहिए था .उन्हें प्रशासन व् सरकार को यह दिखाना चाहिए था कि हमारी जान इतनी भी सस्ती नहीं कि हम बम विस्फोटों की भेंट चढ़ने हेतु फिर निकल पड़ें .उन्हें हर सार्वजानिक कार्य का बहिष्कार कर यह सन्देश देना चाहिए था कि सत्तासीन लोगों सावधान हो जाओ -हम अब अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं .आप सत्ता भोग करने हेतु मंत्री पदों पर नहीं बैठाये गए हैं .हमें अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहिए तभी हम  सामान्य रूप से सार्वजानिक कार्यों में लग पाएंगे .हम आप से सवाल करते हैं अपनी सुरक्षा को लेकर -अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर .आप क्या कर रहे हैं ?
                     प्रशासनिक लापरवाही का  विरोध तो मुम्बईवासियों को करना ही चाहिए था -जिसका एकमात्र स्वरुप हर सार्वजानिक कार्य का बहिष्कार था .हौसला टूटना नहीं चाहिए पर आक्रोश भी ऐसे समय पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए जिससे सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वालों की कुम्भकर्णी नींद टूटे वरना सुन्न हुए अंग की भांति हमारी भावनाएं भी सुन्न पड़ जाएँगी .

                           ''मौत के आगे घुटने मत टेको ;
जिन्दगी को मौत बनने से भी रोको ;
हर हालत को सह जाना होशयारी नहीं 
एक बार तो खिलाफ़त करके भी देखो .
                    शिखा कौशिक 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

मधुर का तनाव जायज है !




मधुर  का  तनाव जायज है !

ऐश के गर्भवती होने से मधुर भंडारकर सदमे में हैं .मधुर ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए जो कहा उससे मैं सहमत हूँ -''हीरोइन परियोजना रुक जाने के बाद आज मै अपने कार्यालय में अकेला बैठा हूँ .जिस परियोजना पर मैं पिछले डेढ़ साल से पसीना बहा रहा था,उसे मैं ऐसे ही बंद न होने देता .यह मेरे कैरियर की सबसे महत्वकांक्षी  परियोजना होने जा रही थी ''
                हो सकता है आप में से कुछ उनके इस कथन को इस तरह ले कि ''मधुर केवल व्यवसायिक दृष्टिकोण से सोच रहे हैं ''पर मैं नहीं मानती यह सही है कि किसी भी अभिनेता का या अभिनेत्री का निजी जीवन किसी और के सपनों को इस तरह बर्बाद कर डाले .ऐश्वर्या एक स्थापित अभिनेत्री हैं .किसी भी फिल्म का हिस्सा बनने से पहले उन्हें स्वयं यह निर्णय लेना चाहिए था कि वे अब प्राथमिकता किसे देती है -माँ बनने को अथवा फ़िल्मी जीवन को .एक सामान्य स्त्री के गर्भधारण में और एक सफल व् कई परियोजनाओं का हिस्सा बनी अभिनेत्री के गर्भधारण में जमीन-आसमान का अंतर है .आपको यदि माँ बनना है तो किसी की महत्वकांक्षी  योजना का हिस्सा क्यों बन रही हैं ?यहाँ यह कहना भी हास्यासप्रद  है कि अचानक ही ऐसा हो गया ?
                                       मधुर जी अब एक बात तो आप हमेशा याद रखेंगे ही कि किसी विवाहित अभिनेत्री को हीरोइन बनाना कितना बड़ा जोखिम का काम है ! 

                                                                                        शिखा कौशिक 
                                                           http://vicharonkachabootra.blogspot.com
                                    



सोमवार, 4 जुलाई 2011

अब बदनाम ही रुतबे वाला है !

अब बदनाम ही रुतबे वाला है !

कल के दैनिक हिंदुस्तान  में एक खबर पढ़कर मेरा मन घृणा से भर उठा .शीर्षक  था -''जेल से छूटते ही मरिया का महिमामंडन  शुरू ''.नीरज ग्रोवर हत्या कांड में सबूत मिटाने  वाली क्रूर ह्रदय मारिया सुसाईराज   तीन साल की सजा काटकर शनिवार को जेल से रिहा हो गयी .ऐसी दुष्ट औरत के साथ समाज यदि कठोर रुख नहीं अपना सकता तो यह भी तो शोभा नहीं देता कि उसको तथाकथित ''स्टार'' का दर्जा प्रदान किया जाये पर इलेक्ट्रौनिक  मीडिया से लेकर फिल्म निर्माता तक उसकी बदनामी को भुनाने के लिए उसके आगे-पीछे चक्कर लगा रहें हैं .अख़बार में इस बदनामी को ''लोकप्रियता'' कहा गया है .संवाददाता को दस बार विचार करना चाहिए  था इस एक शब्द ''लोकप्रियता 'को लिखने से पहले .यदि यही लोकप्रियता है तो फिर तो आज भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय ''अजमल कसाब ''है .रामगोपाल वर्मा ने खुलेआम मरिया पर एक फिल्म बनाने  की घोषणा की है ,कलर्स चैनल ''बिग बौस'' में लेने के लिए उत्सुक है -आखिर क्यों ?ये हम दर्शकों को भी सोचना है .मारिया के प्रति आप क्या मेरे जैसे विचार नहीं रखते -

                  ''जो टुकड़े जिस्म के नीरज के किये थे  
                        ए-मारिया भला वे छिप सके कहाँ ?
               मुझको तो तेरी सूरत पर 
              अब भी नजर आते हैं ''
ऐसी क्रूर अभिनेत्री पर तो आजीवन फिल्मों में काम  करने पर  प्रतिबन्ध होना चाहिए और ऐसी क्रूर स्त्री को जो ''स्टार'' का दर्जा दें वे इन्सान नहीं शैतान ही हैं -

                  ''   उस इन्सान के भीतर शैतान भी है रहता 
                जो कातिलों को आज भगवान कह रहा है  ''
                                          
                                                               शिखा कौशिक 
                  http://vicharonkachabootra.blogspot.com

गुरुवार, 30 जून 2011

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी [भाग-३ ]

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी  [भाग-३ ]

कई बार तो ब्लोगर हताश होने लगता है.महत्वपूर्ण विषय पर लिखे आलेख पर एक या आधी ही टिप्पणी प्राप्त होती है वहीँ अर्थहीन आलेखों पर टिप्पणिओं की बौछार .दिल में एक आह! उठती है........सोचता है -क्यूँ न ब्लोगिंग को अलविदा ही कह दूं -

                   ''आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक 
                     कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक .''

ऐसी विषम परिस्थिति में कुछ ब्लोगर फरिश्तों के रूप में उसको साहस देने के लिए उपस्थित होते हैं .साहस देते हैं संघर्ष करने का .वे उसे मन्त्र बतलाते हैं -''न दैन्यं न पलायनं '.न किसी की टिप्पणी का इंतजार करो और न ब्लोगिंग से पलायन.वे कहते हैं ब्लोगिंग का तो मजा ही ये है-

                 ''इशरते कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना 
                     दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना ''

वे समझाते हैं किसी की टिप्पणी को लेकर अपने सिर में दर्द मत करो .लिखते रहो....लिखते रहो.....लिखते रहो -

                         ''ग़ालिब बुरा न मान जो वाइस बुरा कहे 
                         ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे ''

वे अपना फलसफ़ा बताते हैं जिससे ''ब्लोगिंग छोड़ने ''का कुत्सित विचार फिर से ब्लोगर के ह्रदय में न आये-

                     ''रोक लो गर गलत चले कोई 
                    बख्श दो गर खता करे कोई ''

इस पर भी कोई दुष्ट पीछे पड़ ही जाये आपकी अच्छी-भली पोस्ट की धज्जियाँ उड़ाने के लिए तो धीरज रखिये-

                     ''की वफ़ा हमसे तो गैर उसको जफा कहते हैं 
                       होती आई है कि अच्छों को बुरा कहते हैं ''

                                -अंत में -
प्रत्येक ब्लोगर को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि कहीं ब्लोगिंग जानलेवा ही न बन जाये .आप खुद परखें आप में ये गंभीर लक्षण तो दिखाई नहीं दे रहे -

१-अच्छी पोस्ट लिखने पर जब टिप्पणी न मिले तो आप ऐसा महसूस करते हैं -

                      ''आ के मेरी जान को करार नहीं है 
                       ताकते-बेदादे-इंतजार नहीं है ''

२-आपकी अन्य गतिविधियाँ ठप्प पड़ गयी  हैं बस हर समय ब्लोगिंग-ब्लोगिंग-ब्लोगिंग ही दिल-दिमाग पर छाई रहती है आप खुद को निक्कमा महसूस करने लगें है -
         
                    ''इश्क ने 'ग़ालिब' निक्कमा कर दिया 
                   वरना हम भी आदमी थे काम के ''

३-आप खाना-पीना यहाँ तक की सोना -हँसना तक भूलने लगे हैं ब्लोगिंग के तनाव में -

                   ''आगे आती थी हाले दिल पे हंसी 
                      अब किसी बात पर नहीं आती ''

यदि ऊपर वर्णित लक्षणों में से कोई भी लक्षण आप खुद में देखें तो अनुभवी ब्लोगर से जरूर सलाह ले क्योंकि ब्लोगिंग अनुभवी ब्लोगर्स की नजर में तो बस यही है -


           ''ये इश्क नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजिये 
             इक आग का दरिया है और डूबते जाना है ''
  
                                                                                                  समाप्त 
                           शिखा कौशिक http://vicharonkachabootra.blogspot.com

मंगलवार, 28 जून 2011

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी [भाग दो ]

ब्लोगिंग  और  ग़ालिब की शायरी [भाग दो ]
     कुछ टिप्पणीकार तो साधारण पोस्ट की भी इतनी प्रशंसा कर देते हैं की ब्लोगर स्वयं यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि ऐसा क्या लिख दिया है मैंने कि ये टिप्पणीकार इतनी तारीफ कर रहे हैं -

                            ''दिल से तेरी निगाह जिगर में उतर गई ,
                             दोनों को इक अदा में रजामंद कर गयी .''

लेकिन ऐसा नहीं कि केवल प्रशंसा ही हो .अति आलोचना का भी शिकार बनना पड़ता है .ब्लोगर खुद को कोसता है  कि किस मनहूस घडी में मैंने यह पोस्ट डाली थी ? मुंह-दर-मुहं हो तो मार-पिटाई तक भी बात पहुँच सकती है पर ब्लॉग-जगत की गरिमा बनायें रखने के लिए ब्लोगर आलोचनाकार को बार-बार ''जी'' लगाकर अपनी बात समझानें का प्रयास करता है .इस पर भी यदि आलोचनाकार न माने तो दिल में ये तो आता ही है -

                           ''हर एक बात पर कहते हो तुम कि तू क्या है ;
                                 तुम्ही कहो कि ये अंदाजे -गुफ्तगू क्या है .''

थोडा सख्त लिख दिया तो आलोचनाकार ब्लोगर को ''अशिष्ट'' की संज्ञा देने में एक मिनट नहीं लगाता. होतें रहें आप सक्रिय-ईमानदार ब्लोगर पर आलोचनाकार की टिप्पणिया आहात तो कर ही जाती है -

                       ''होगा कोई ऐसा भी कि ''ग़ालिब ''को न जाने ;
                       शाइर तो वह अच्छा है पर बदनाम बहुत है .'' 

पर साहब जी ब्लोगिंग करते-करते ब्लोगर भी पक्का हो  जाता है .दो दिन हुए नहीं इस घमासान को कि फिर एक नयी पोस्ट तैयार -

                 ''रोने से और इश्क में बेबाक हो गए;
                    धोये गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए .''

अब टिपण्णी प्राप्त करनी है तो अन्य के ब्लॉग पर जाकर करनी भी होगी .जब तक ऐसी भावना मन में नहीं आती ब्लोगर का उद्धार होना मुश्किल है -

                                 ''हाँ भला कर तेरा भला होगा ;
                                    और दरवेश की सदा क्या है .''

भूले-भटके किसी ऐसे ब्लॉग पर पहुँच जाएँ जहाँ अनुसरनकर्ताओं की संख्या सौ-दो सौ-या हज़ार हो तो मन मचल उठता है और थोडा उदास भी हो जाता है अपने अनुसरनकर्ताओं की संख्या याद कर -

                        ''ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता
                          अगर और जीते रहते यही इंतजार होता .''

लेकिन चाहने से क्या होता है?ये तो अन्य ब्लोगर्स का हक़ है कि वे आपके ब्लॉग का अनुसरण करें न करें .हर ख्वाहिश पूरी हो ये जरूरी तो नहीं -

                        ''हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले 
                         बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले .
           
                                                                                                              [....जारी ]
                                              शिखा कौशिक 
                     http://vicharonkachabootra.blogspot.com


रविवार, 26 जून 2011

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी -भाग -१ ]

ब्लोगिंग और ग़ालिब की शायरी -[भाग -१ ]

भाई जबसे ब्लॉग बनायें हैं रातों की नींद उड़ गयी और दिन का सुकून खो गया .बार-बार दिल में यही गूंजता है -
''दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है ;
आखिर इस दर्द की दवा क्या है .''

ऊपर से कोई ब्लॉग-पोस्ट लिखकर ब्लॉग पर प्रकाशित कर दो तो टिप्पणियों का इंतजार करते-करते अच्छा खासा ब्लोगर भी बेहाल हो जाता है .दिल में एक हूक..........सी उठती है -

''बनाकर फकीरों का हम भेस ''ग़ालिब''
तमाशा-ए-अहले-करम देखते हैं .''

इधर-उधर टाइम पास कर फिर से ब्लॉग खोलो तो ''नो कमेन्ट'' देखकर रहा-सहा सब्र भी जवाब देने लगता है .ब्लोगिंग न हुई मरी ''इश्क '' की बीमारी हो गयी -

''इश्क से तबियत ने जिस्त का मजा पाया ;
दर्द की दवा पाई दर्द बे-दवा पाया .''

अब ब्लोगिंग की बीमारी से ग्रस्त ब्लोगर के लिए तो मानो जीना-मरना सब बराबर .ब्लॉग देखे बिना भी चैन नहीं और देख कर भी -

''मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने-मरने का
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले .''

ले-दे कर यदि कई दिन में एक-आध टिपण्णी आ जाती है तब भी दिल को सुकून कहाँ -

''उनके देखे से जो आ जाती है मुहं पर रौनक ;
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है .''

फिर भी टिप्पणीकार के प्रति ह्रदय अगाध श्रद्धा से भर उठता है -

''वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है ;
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं .''

[जारी]
शिखा कौशिक

शुक्रवार, 3 जून 2011

पिता के साथ धोखा मत कीजिये !

पिछले वर्ष हमारे जिले में एक प्रेमी युगल घर से फरार हो गए थे .पुलिस ने दो लाशों की शिनाख्त उन दोनों के रूप में कर भी दी थी .क़त्ल के आरोप में लड़की के पिता-भाई  को पुलिस ने  गिरफ्तार कर लिया  और १४-१५ वर्षीय भाई ने पुलिस के समक्ष यह स्वीकार कर लिया कि उसने ही ये क़त्ल किये हैं .कहानी में मोड़ तब आया जब फरार प्रेमी युगल जिन्दा वापस लौट आये .पुलिस के पास इस बात का जवाब नहीं था कि यदि ये दोनों जिन्दा हैं तो वे लाशें किसकी थी ?बाद में लड़के के घर वालों ने लड़की को स्वीकार कर लिया और उसके गर्भ में पल रहे शिशु को भी .ये तो इस कहानी का सुखद अंत हो गया पर उस लड़की ने पिता के विश्वास को जिस तरह तोडा है कम से कम मैं तो उससे कभी सहमत नहीं हो सकती .वह लड़की घर से बाहर अपनी मौसी के यहाँ रहकर कोई प्रिओफैनल कोर्स कर रही थी .जब हमारे माता-पिता इस पुरुष प्रधान समाज में भी हमें यह मौका देते है कि हम  आर्थिक रूप से सक्षम बन सकें  तब हमारा भी यह कर्तव्य है कि हम घर से बाहर रहकर  भी अपने माता पिता की इच्छाओं का ध्यान  रक्खे .मेरी जानकारी की एक अति विदुषी  महिला प्रवक्ता हैं .वे बताती हैं कि उनकी रुचि विज्ञानं विषय में थी किन्तु इसके लिए को .एड  .कॉलिज में प्रवेश लेना पड़ता .जिस समय उनके प्रवेश लेने की बात थी तभी एक लड़की किसी कॉलिज के  लड़के के साथ घर से भाग गयी और उनके पिता ने इस डर से कि कंही हमारे साथ भी ये हादसा न हो जाये उनका उस कॉलिज में प्रवेश नहीं कराया .असंयमित  ऐसी लडकिया यह नहीं सोच पाती कि उनके एक गलत कदम से कितनी लड़कियों का भविष्य फिर से चौखट के भीतर धकेल दिया जाता है .ऊपर जिस घटना का जिक्र मैंने किया है उसमे बाद में यह बात भी सामने आई कि लड़की के पिता ने उसके इस कदम से शर्मिंदा होकर जहर खा लिया था इसी कारण छोटे भाई ने क़त्ल का आरोप अपने पर लेकर अपने पिता को पुलिस के उत्पीडन से बचाने का प्रयास किया था .मैं केवल इतना कहना चाहूंगी ऐसी लड़कियों से कि जब आप ऐसे कदम उठाती हैं तब एक बार अपने पिता के बारे में सोचिये जिसने आपको सब कुछ दिया पर आप केवल अपने स्वार्थ में अंधी होकर उनकी भावनाओं  से धोखा कर जाती है .
                                           शिखा कौशिक 

मंगलवार, 31 मई 2011

भ्रष्टाचार का वास्तविक दोषी कौन ?




१५ अगस्त १९४७ को भारतवासी विदेशी दासता से मुक्त हुए .भारतीय संविधान के अनुसार हम भारतीय ''प्रभुत्व संपन्न गणराज्य के नागरिक ' हैं परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमने जिस राष्ट्र का सपना संजोया था क्या आज का भारत वही भारत है ?...जिन संकल्पों के साथ देश के सामाजिक -आर्थिक विकास की आधारशिला रखी गयी  थी क्या हम उन पर अटल रहे ?..आँखें खोल कर देखिये आज हमारा राष्ट्र किस गंभीर समस्या से जूझ रहा है .पिछले कुछ समय में भ्रष्टाचार के अनेक मामलें जिनमें -२जी स्पेक्ट्रम घोटाला ,.राष्ट्रमंडल खेल से सम्बंधित घोटाला ,आदर्श सोसाइटी घोटाला,आई .पी. एल .घोटाला ,एल.आई.सी.का आवास कर्ज घोटाला आदि प्रमुख हैं -उभरकर सामने आये हैं .इस स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आज हमारे समक्ष ''भ्रष्टाचार ' ''एक चुनौती बनकर खड़ा हो गया है .यद्यपि ''भ्रष्टाचार'' देश के लिए कोई नया मुद्दा नहीं है किन्तु आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि आज तक बड़े-बड़े घोटालों में लिप्त भ्रश्ताच्रियों को कोई सजा नहीं मिल पाई क्योकि भ्रष्टाचार निवारण के लिए जो भी तंत्र बनाये गए -वो चाहे विभागीय जाँच हो या केन्द्रीय सतर्कता आयोग ,लोकायुक्त अथवा सी.बी.आई.-ये सब एजेंसिया भ्रष्टाचार की आंधी को थामने में पूर्णतया  विफल रही है .                                        ''ट्रांसपेरेंसी इंटर्नेशनल   'से लेकर 'ग्लोबल फिनांशियल इंटीग्रीटि  [g.f.t.] की ताजा रिपोर्ट भी यह संकेत करती है कि सन १९९०-९१ में अपनाये उदारीकरण के पश्चात् हमारे देश में भ्रष्टाचार तेज़ी से बढ़ा है  .ट्रांसपेरेंसी इंटरनॅशनल  की रिपोर्ट के अनुसार २००९ में भारत भ्रष्टतम राष्ट्रों की सूची में ८४ वें नंबर पर था ,लेकिन अब और भ्रष्ट होकर ८७ वें स्थान पर पहुँच चुका है.
      हर ओर भ्रष्टाचार है -चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो अथवा नौकरशाही  ,न्यायपालिका हो अथवा सेना -राजा-प्रजा सब भ्रश्तर में बराबर के जिम्मेदार हैं .लीलाधर जूगडी की ये पंक्तियाँ यहाँ सटीक  बैठती  हैं -

                                       ''इस व्यवस्था में 
                                         हर आदमी कही न कही चोर है .''


*भ्रष्टाचार आंकड़ों पर एक नज़र -

*स्वतंत्रता के पश्चात् जो महाघोटाले हुए हैं उनमे दस बड़े घोटालें इस प्रकार हैं -बोफोर्स घोटाला ,हर्षद मेहता कांड ,केतन पारिख कांड,हवाला घोटाला ,चारा घोटाला ,तेलगी घोटाला ,सत्यम घोटाला ओर २जी स्पैक्ट्रम घोटाला .इन दस महाघोटालों में एक अनुमान के अनुसार घोटालेबाज जनता का तीन लाख करोड़ रूपया हजम कर गए .कहने की आवश्यकता नहीं कि इतनी बड़ी रकम से देश को विकास पथ पर अग्रसर करने में कितनी सहायता मिलती .घोटालों में सीधे तौर पर राजनेताओं व् नौकरशाहों की जुगलबंदी सामने आई . 

*एक अनुमान के अनुसार स्विस बैंक में भारतीयों का ७० लाख करोड़ रूपया जमा है .कानूनविद रामजेठमलानी का मानना है कि यदि यह पैसा भारत वापस आ जाये और आज की जनसँख्या के हिसाब से सारे परिवारों में बाँट दिया जाये तो प्रत्येक भारतीय परिवार को ढाई लाख रूपये मिलेंगें .भारत की अर्थव्यवस्था अगले तीस साल तक के लिए कर्ज़ रहित हो जायेगीऔर विदेशों से लिया गया सारा क़र्ज़ भी चुकता हो जायेगा किन्तु क्या इतने भ्रष्ट राजनैतिक परिवेश में ये पैसा वापस आने की उम्मीद भी की जा सकती है ?

*राजनीतिज्ञों के पश्चात् देश का सञ्चालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नौकरशाहों पर आरोप है कि वे प्रतिवर्ष ७ अरब डॉलर यानि ३१५ अरब रूपये डकार जाते हैं .नीरा यादव ,रवीन्दर सिंह,गौतम गोस्वामी   ,केतन देसाई का नाम भ्रष्टाचार के क्षेत्र में काफी जोर से उछला है .

*सेनाएं अपने त्याग व् बलिदान के लिए जानी जाती हैं किन्तु आज भारत में भ्रष्टाचार की दीमक इन्हें भी खोखला कर रही है .१९४८ में जीप घोटाला  ,१९७० के दशक में घटिया कम्बल खरीदने पर हंगामा से लेकर घोटालेबाज इतनी नीचता पर उतर आये कि शहीद जवानों के लिए खरीदे गए ताबूतों में भी पैसा खाने से पीछे न हटे.

*देश की न्यायपालिका खुद भ्रष्टाचार के घेरे में हैं .अपने पक्ष में फैसला करवानें के उदेश्य से ,जमानत हासिल करने आदि के लिए रिश्वत की पेशकश होते ही कई न्यायाधीशों  का ईमान डोल जाता है .जस्टिस वी.रामास्वामी ,जस्टिस शमित मुखर्जी  ,जस्टिस सौमित्र सेन नयायपालिका के दमन पर दाग की भांति हैं .ये और कई अन्य न्यायिक अफसरों से लेकर बाबुओं की अदालत में घूसखोरी की प्रवर्ति ने न्यायालयों को दलाली का अड्डा बना डाला है .

*अन्य घोटालों में वर्ष १९९६ में हुए चारा घोटाला में ६५० करोड़ की चपत लगी .झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा पर राज्य के विकास के ४हजर करोड़ के घोटालों का आरोप लगा .

*सन २०१० में तो घोटालों की भरमार रही .कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले में ३.१८ करोड़ हजम किये गए .इस घोटाले को सभ्यों द्वारा डाली गयी डकैती का नाम भी दिया गया .आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी पर आरोप है कि इसमें उनकी मुख्य भूमिका है .आजकल सी.बी.आई. रिमांड पर है .१००० करोड़ रूपये का आदर्श सोसाइटी घोटाला [शहीदों के परिवारों के लिए बने फ़्लैट ] नैतिकता की सभी सीमाओं को लाँघ गया .नेताओं और रीयल स्टेट के दलालों का गठजोड़ इस घोटाले में सारी रकम डकार गया .२जी स्पैक्ट्रम आवंटन मामले में १.७६ लाख रूपये का घोटाला हुआ .६०० करोड़ रूपये का कर्नाटक जमीन घोटाला भी चर्चा में रहा .

                     उपरोक्त घोटालों के अतिरिक्त भ्रष्टाचार के विरूद्ध काम करने वाली संस्था केन्द्रीय सतर्कता आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो गए जब सर्वोच्च न्यायलय ने पी. जी. थॉमस की नियुक्ति पर प्रश्नचिह्न लगा दिए .कौन है इन सब घोटालों के लिए जिम्मेदार? केन्द्रीय सर्कार,राज्य सरकार,नौकरशाही ,भ्रष्ट न्यायलय या हम सब ?वर्तमान केन्द्रीय सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों पर नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने रोचक टिप्पणी देकर पिछली सरकारों के आचरण पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए .उन्होंने कहा कि -''मौजूदा  सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है लेकिन मैं यह नहीं मानता कि यह कोई नई परिघटना है .यदि पिछली सरकार की जाँच की जाये तो वहां भी वही कहानी होगी .''अर्थात भ्रष्टाचार के लिए सत्ता में बैठे लोग जिम्मेदार हैं -यह मान लिया जाये किन्तु सेना में भ्रष्टाचार के मुद्दे  पर दी गयी एअर मार्शल [रिटायर्ड] ए. के.सिंह की टिप्पणी भ्रष्टाचार के बढते हुए जंजाल हेतु सारे समाज को ही इसके दायरे  में लेती है . .वे कहते हैं -''जो समाज में हो रहा है उससे सेना भी अछूती नहीं है .इसी समाज के लोग सेना में आते हैं इसलिए यह कहना कि अकेला सेना में  भ्रष्टाचार बढ़ा  है ठीक नहीं .समाज के सभी हिस्सों में भ्रष्टाचार बढ़  रहा है .''

*भ्रष्टाचार का वास्तविक दोषी कौन ?

समाज में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो आखिर दोषी कौन है ?राजनीति  ,नौकरशाही ,पुलिस विभाग,न्यायपालिका में पदासीन लोग कहाँ से आते हैं ?कौन हैं वे ?वे भी तो हमारे द्वारा चुने जाते हैं ,हमारे परिवार -समाज का ही तो हिस्सा हैं हैं .एक अनुमान कहता है की अस्सी प्रतिशत भारतीय जनता मानती है किहमारे नेता भ्रष्ट हैं किन्तु जरा अपने गिरेबान में झांककर देखिये कहीं आप अपने गली-मोहल्ले के इमानदार राजनैतिक कार्यकर्त्ता को ठुकराकर बाहुबली क्षेत्रीय  व्यक्ति को तो नहीं चुनते ?
                                     जंतर-मंतर पर नारे लगाने और अन्ना की जय-जयकार करने वालों में कितने  हैं जो अदालत में अपना काम निकलवाने  ,अपने बच्चे के अच्छे स्कूल में एडमिशन करवाने हेतु -घूस ,डोनेशन,टिप,खर्चा-पानी आदि का सहारा नहीं लेते ?यह ठीक है कि बड़े-बड़े घोटालों में नेताओं -नौकरशाहों-कार्पोरेट लौबी का गठजोड़ ही सब हजम कर जाता है किन्तु क्या ये सभी हमेशा से भ्रष्ट थे अथवा इन्हें भ्रष्ट होने का मौका हमने दिया .हम चुप रहना जानते हैं ,सहन करना जानते हैं,सब कुछ देखकर नज़रअंदाज करना जानते हैं तो फिर भ्रष्टाचार पर शोर क्यों और वो भी जमीनी स्तर पर नहीं .
                                 आज सभी के दिल में धुक-पुक है कि १५ अगस्त तक जन लोकपाल विधेयक पास हो पायेगा या नहीं पर हमारी जैसी सोयी हुई जनता इसके पास होने पर भी भ्रष्टाचार का क्या बिगाड़ पायेगी ?हम क्यों उम्मीद करते हैं कि नेता बदले,नौकरशाह बदले-हम सबसे पहले खुद को क्यों नहीं बदलना चाहते  ?हम अपने अंतर्मन तक को तो समझा नहीं पाते फिर भ्रष्टाचार को समूल नष्ट क्या कर पाएंगे ?
                                  हम सब भ्रष्ट हैं क्योंकि हम प्रत्येक अवसर पर अपनी अंतरात्मा की आवाज को दबाते हैं .पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलम जी के शब्दों में -''यदि वह अपनी अंतरात्मा की आवाज नहीं सुन सकता है तो यह भ्रष्टाचार की निशानी है क्योंकि ऐसा व्यक्ति सही और गलत में फर्क नहीं कर सकता .''
                  इसलिए सर्वप्रथम हमें स्वयं को सुधारना होगा .भ्रष्टाचार कैसे मिटे इस सम्बन्ध में डॉक्टर त्रिलोचन शास्त्री जी के द्वारा दिए गए सुझाव यहाँ बतलाना सार्थक रहेगा -
''हमें पूरे तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने तीन कारकों पर काम करने की आवश्यकता  है -
१-सरकार पर बड़े-बड़े उद्योग जगत,कार्पोरेट और पूंजीवादियों की मजबूत पकड़ को कम  करना होगा .
२- हमें निचले स्तर पर घूस लेने की प्रवर्ति के खिलाफ एक नई और कारगर रणनीति बनाने की जरूरत है .
३- इसके खिलाफ बुद्धिजीवियों ,स्वयंसेवी संगठनों और मीडिया को आगे आना होगा .जब तक भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा नहीं बनेगा -इसकी सफाई नहीं होगी .
                              इसके अतिरिक्त परिवार व् समाज को अपनी जिम्मेदारी उठानी होगी .डॉक्टर अब्दुल कलाम जी का यह कथन यहाँ सटीक बैठता है -'' देश को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने का काम माता-पिता और अध्यापक ही कर सकते हैं .'' हमें अपनी समस्त आत्मशक्ति को जगाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होना होगा क्योंकि इसे बढ़ावा देने के वास्तविक दोषी भी तो हम ही हैं -
                   '' छोड़ विवशता वचनों को व्यवस्था धार बदल डालें ,
                 समर्पण की भाषा को तज क्रांति स्वर में ललकारें ,
              छीनकर जो तेरा हिस्सा बाँट देते हैं ''अपनों'' में 
           लूटकर सुख तेरा सारा लगते सेंध सपनों में ;
                 तोड़कर मौन अब अपना उन्हें जी भर के धिक्कारें 
     समर्पण की भाषा को तज क्रांति स्वर में ललकारें .''

                                                      शिखा कौशिक