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शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

''अन्ना तुम संघर्ष करो -मन-मैला पुर भी साथ है !


[गूगल से साभार ]
हाथों में तिरंगा  लिए ''वन्देमातरम'' का उद्घोष करती मन-मैला पुर की जनता सभा स्थल की ओर बढ़ रही थी .भीड़ का नेतृत्व कर रहें हैं  पूर्व-मंत्री जो कल ही क़त्ल के एक मुक़दमे में जमानत पर छूटकर  आये थे .घर से चलने से पहले पत्नी ने उनके पेट  में फल   व् मेवे   खूब  ठूस दिए थे ;ये कहकर ''कहीं अन्ना के चक्कर में तुम भी भूखे मरते फिरो .'' भीड़ में मुख्य रूप से जो शामिल थे उनमें न्यायाधीश से लेकर कोर्ट के चपरासी ,पंसारी लाला से लेकर शिक्षक ,फ़िल्मी हस्तियों से लेकर लोकल नेता और गृहिणी से लेकर सफाई कर्मचारी ,नगरपालिका अध्यक्ष से लेकर छात्र-छात्रा -ये समझ लीजिये सारी जनता ही निकल पड़ी है .किसलिए ?अजी वही '' भ्रष्टाचार हटाने के लिए जन लोकपाल बिल के मसौदे को मंजूरी दिलाना ''
मिलावट चौक पर पहुँचते ही  न्यायाधीश साहब का मोबाईल बज उठा .वे ''अन्ना तुम संघर्ष करो ;हम तुम्हारे  साथ हैं ''का नारा लगाते हुए कॉल रिसीव करने लगे ''.......नहीं भाई .....पचास से नीचे नहीं ......करोड़ों का अवैध निर्माण है ....कानून के खिलाफ जाकर स्टे दूंगा तो ......इतने का हक़ तो मेरा बनता ही है .ईमानदारी की बात है ......इससे कम नहीं .....चलो शाम तक पहुँचता हूँ ......घर पर सब सैट कर लेंगें ....अभी तो मैं भ्रष्टाचार मिटाओ ...आजादी की दूसरी लड़ाई ...रैली में हूँ .ओ. के.''और ''इन्कलाब जिंदाबाद ''का नारा लगाते हुए आगे बढ़ लिए .
भीड़ में हाथ में नारे लिखी तख्तियां  लिए माया और शीला भी थी .माया के हाथ में जो तख्ती थी उस पर लिखा था  -''फूल नहीं चिंगारी हूँ;मैं भारत की नारी हूँ ''.शीला ने धीरे  से कोहनी मारकर  माया से कहा-''देखती हो जया के कान में हीरे के कुंडल हैं....कितने के होंगें करीब ?'' माया मुंह बनाती  हुई बोली ''शीला बहन मेरे पास कहाँ ऐसे कुंडल !मैं क्या जानू इनकी कीमत  के बारे में ......सबका अपना भाग  है ....जब से जया का पति सरकारी नौकरी में लगा तब से इनके घर पर लक्ष्मी की कृपा हो गयी ......ऊपर  की कमाई भी तो बहुत है ना .......एक हमारे मियां जी हैं कितनी  बार कहा -अरे फर्जी बीमारी बता बता कर तुम भी कुछ कमा लिया करो ......पर हिम्मत ही नहीं उनमे ...वर्ना आज डॉक्टरों से ज्यादा कोई कमा रहा है क्या !''...''शीला सुर में सुर मिलाती हुई बोली ''...हाँ बहन सच कहती हो ऊपर की कमाई के लिए जिगर चाहिए ...मेरे पतिदेव पुलिस की नौकरी में लगकर भी कुछ नहीं कमा पा रहे ....थाने में जो हिस्सा बंधा है वो भी बहुत कम है ...'' तभी जोर से फिर नारा गूंजा -''सत्यमेव जयते .....सत्यमेव जयते ''
लाला जगलूट  ने भीड़ से थोडा अलग जाकर मोबाईल मिलाया अपने नौकर से -''अबे जब तक मैं इस भ्रष्टाचार निवारण रैली से वापस आऊं तब तक तू नकली  घी  बनाने  का काम पूरा करवा लियो
....और हाँ छोटू देसी चनों की बोरी में कंकड़ ठीक से मिला  लियो .....''यह कहकर फोन काट  दिया और लाला जी जोर से जनता के स्वर  से स्वर मिलते हुए चिल्लाये-''लाठी डंडे खायेंगे -जन लोकपाल बिल लायेंगे ''
रैली सभा स्थल पर पहुंची .व्यवस्था देख पत्रकार भड़क  गये  -ये क्या व्यवस्था की है संयोजकों ने ....न चाय-पानी ...न बैठने को कुर्सियां ......कल को इनके  कार्यक्रम  की हवा निकाल देते है ....ऐसी खबर छापेंगे कि  ...पता चल जायेगा''. तभी मास्टर ट्यूशन पाल जी मुस्कुराते हुए एक पत्रकार के पास पहुंचें-''भाई कल के अखबार में मेरा नाम जरूर होना चाहिए '' यह कहते हुए एक सौ का नोट पत्रकार की जेब में डाल दिला .तभी नारा गूंजा -''सोनिया जिसकी मम्मी  है ,वो सरकार निकम्मी है''
मंच के  समीप खड़े लोकल नेताओं के चेहरों पर चमक थी और वे बातें बनाने में मसरूफ थे -''सरकार की खिलाफत का बढ़िया समां बंध गया है .अब के अपनी पार्टी की सरकार आ जाये तो दो-एक खाते हम भी स्विस बैंक में खुलवा ही लें .'' तभी जोर से नारा गूंजा -''हर जोर जुल्म की टक्कर पे ;संघर्ष हमारा नारा है ....अन्ना तुम संघर्ष करो करो हम तुम्हारे साथ हैं ''
इस बीच मंत्री जी मंच पर पहुँच गए .मंत्री जी के हाथ में माइक आते ही चेलों ने ताली बजानी शुरू कर दी और ''वन्देमातरम ...वन्देमातरम ...''के उद्घोष से आकाश गूंजा दिया .मंत्री जी ओजपूर्ण वाणी में बोले -साथियों समय आ गया है भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेकने का .ये आजादी की दूसरी लड़ाई है .बोलिए -मैं भी अन्ना ...तू भी अन्ना ...अन्ना तुम संघर्ष करो ...मन मैला पुर भी साथ है .जय हिंद '' सारी जनता भी जोर से चिल्लाई -हाँ भ्रष्टाचार मिटाना है...''

[एक प्रश्न यदि मन-मैला पुर की सारी जनता ईमानदार है तो भ्रष्टाचार कैसे है ? ]

शिखा कौशिक
                      [विचारों का चबूतरा ]

सोमवार, 15 अगस्त 2011

आखिर सलट वॉक की जरूरत आज क्यों पड़ रही है ?'

आखिर सलट वॉक की जरूरत आज क्यों पड़ रही है ?'


कई ब्लोग्स पर सलीम खान जी की यह प्रस्तुति देखी -
इस आलेख में उन्होंने यह सूचना दी कि आगामी २१ अगस्त को लखनऊ में सलट वॉक का आयोजन होगा .उन्होंने इसे लखनऊ की तहजीब पर प्रहार बताया  है .हिन्दुस्तानी  स्त्रियों पर यह निशाना साधा है कि हिन्दुस्तानी तहजीब में स्त्री को देवी का दर्जा प्राप्त है पर आज की कुछ सिरफिरी  युवतियां अपने को देवी की जगह सलट कहलाना ज्यादा पसंद कर रही हैं .उनका कहना है ये वे युवतियां हैं जिनकी रोटी बेशर्मी वाले  रास्ते  से होकर चल रही है.
                  चलिए आपकी  सब बातें सही हैं पर एक मुद्दा मैं देती हूँ आप जैसी विचारधारा वालों  को कि ''आखिर सलट वॉक की जरूरत आज क्यों पड़ रही है ?''अब यह तर्क  मत दीजियेगा कि''युवतियों में संस्कार नहीं रहे .''क्योंकि एक लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है ऐसी घटनाओं की जिसमे पशुबल संपन्न पुरुष ने सिर से पैर तक ढकी स्त्री को अपनी वासना का शिकार बना डाला .सलट वॉक में शामिल होने वाली युवतियों के प्रति अपमानजनक टिप्पणी करना उसी आदिम सोच को प्रकट करता है जो स्त्री के तन-मन पर अपना अधिकार बनाये रखना चाहती है क्योकि उसके विचार में स्त्री को उन्ही चौखटों के भीतर रहना चाहिए जो स्वामी पुरुष ने उसके लिए निर्धारित की हैं . 

                            स्त्री के साथ हुए अत्याचार हेतु स्त्री को दोषी कहने वाली
सोच को ऐसी ही सलट वॉक आइना दिखा सकती हैं.हमारी तहजीब हमारे विचारों से झलकती है.दिल्ली की उमंग द्वारा आयोजित सलट वॉक जैसी सफलता लखनऊ में भी दोहराई जाये ऐसी मेरी शुभकामना है .


[सलट वॉक क्या  है -इसे रचना जी  ने  टिप्पणी रूप  में स्पष्ट कर दिया है.आप भी  जानें -
''slut walk एक समाचार या एक क्रांति समाचार था की टोरंटो कनाडा में एक पुलिस अधिकारी ने कहा था महिला को अगर सुरक्षित रहना हैं तो slut की तरह कपडे ना पहना करे । इस पर वहां की महिला ने आपत्ति दर्ज कराने के लिये वाल्क यानी मार्च किया जिसमे उन्होने हर तरीका कपड़ा पहना और कुछ बहुत ही कम कपड़ो में भी रही

शनिवार, 13 अगस्त 2011

एक बिटिया का दृढ़-निश्चय !

एक बिटिया का दृढ़-निश्चय !
[६५७-माधुरी ]

इससे अच्छी खबर और क्या होगी कि एक बेटी अपनी माँ के अधूरे सपने को पूरा करने का दृढ़ निश्चय करे .''अमर उजाला ''दैनिक के ७अगस्त २०११ के अंक में पृष्ठ  -17  पर छपी खबर ''माँ का सपना बेटी करेगी  पूरा '' ने एकाएक ही अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर लिया .बुसान एशियन  गेम्स  की ८०० मी. दौड़  में रजत  पदक जीतने वाली अर्जुन  अवार्डी ' माधुरी 'ने लखनऊ में आयोजित 600 मी . की दौड़ में स्वर्ण पदक
जीतने वाली अपनी बेटी को जैसे  ही विक्ट्री  स्टैंड पर गोल्ड मैडल दिया सारा  स्टेडियम करतल ध्वनि की गडगडाहट से गूंज उठा .तेरह वर्षीय बिटिया ''हरमिलन '' ने यह कहकर सबका दिल जीत लिया कि ''मम्मी का ओलम्पिक में खेल पाने का सपना अब मैं पूरा करूंगी ''यह सुनकर माधुरी ने तो बिटिया को गले से ही लगा लिया .''भारतीय नारी '' ब्लॉग परिवार की ओर से मैं प्रभु से प्रार्थना करूंगी कि ''इस बिटिया के दृढ निश्चय को वे  अवश्य पूरा करें ''
                    माधुरी व् हरमिलन दोनों को बहुत बहुत शुभकामनाएं  .

                                                    शिखा कौशिक 
                                

सोमवार, 1 अगस्त 2011

उमंग ने भरी उमंग !




१९ वर्षीय  छात्रा उमंग सब्बरवाल ने भारत में सल्ट वॉक  का सफलता पूर्वक आयोजन कर भारतीय पुरुष समाज को चुनौती  दी है .प्रसिद्ध साहित्यकार अज्ञेय ने लिखा है कि ''अधूरा देखना अश्लील है ''इसी पंक्ति को यथार्थ में एक आन्दोलन का रूप दे उमंग ने यह बात उठाई कि छेड़कानी  व् बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए लड़कियों द्वारा धारण की गयी वेशभूषा जिम्मेदार नहीं है बल्कि पुरुष की स्त्री को एक उपभोग की वस्तु मानने वाली मानसिकता इसके लिए जिम्मेदार है .बड़ी संख्या में युवाओं ने इस आयोजन में हिस्सा लेकर एक आशा जगाई है .स्त्री को सम्मान देना -हमारी संस्कृति की परंपरा रही है .उम्मीद कर सकते हैं कि पुरुष अपनी सोच में बदलाव लाने का सार्थक प्रयास करेंगे .उमंग को इस सफल आयोजन पर हार्दिक शुभकामनायें .
           शिखा कौशिक

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

यह सम्मान है या अपमान ?

यह सम्मान  है या अपमान ?

इसे महारानी  लक्ष्मीबाई का  सम्मान  कहें  या  अपमान ?यह हमारी भावनाओं के साथ एक खिलवाड़  जैसा है .अमेरिका की प्रतिष्ठित  टाइम पत्रिका ने हाल ही में पति के बचाव में दीवार बनकर खड़ी होने वाली दुनिया की जाबांज पत्नियों की एक सूची जारी की जिसमे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को आठवां स्थान दिया गया है  .कई समाचार पत्रों ने इसे बहुत बड़ी उपलब्धि माना   पर जरा ध्यान दीजिये उनसे ऊपर किस किस को स्थान दे दिया गया है  -
*इलेनोर रूजवेल्ट -[पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की पत्नी ] को ''प्रथम स्थान''
 उपलब्धि -नस्लवाद,गरीबी व् लिंगभेद पर खुलकर अपनी बात रखी .

*जुने कार्टर फिश -कार्टर परिवार से सम्बन्ध.अच्छी गायिका ,डांसर ,गीतकार ,अभिनेत्री और लेखक .इन्हें तीसरा स्थान दिया गया .

*साराह पालिन -सबसे कम उम्र की महिला जो  अलास्का की गवर्नर बनी .इन्हें पांचवां स्थान दिया गया .

*इलेन दी.गेनेरेस -छठवां स्थान -खुले तौर पर माना कि ये एक समलैंगिक हैं .आस्ट्रेलिया की अभिनेत्री .

*सातवाँ स्थान दिया गया है -मिशेल ओबामा को जो वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति की पत्नी हैं .फैशन आइकोन व् रोल मॉडल ke  रूप में उभरी हैं

          इन सब से नीचे आठवां स्थान हमारी रानी लक्ष्मीबाई  को दिया गया है .टाइम पत्रिका  ने यह जानकारी नहीं दी है कि सूची किस आधार पर बनाई गयी है ? ऐसी  सूचियाँ  बनाना  और  उसमे  अतार्किक  रूप से हमारे आदर्श चरित्रों को नीचे  स्थान देना  पत्रिका ke  लेखक मंडल ke  दिमागी  दिवालियापन  को तो जाहिर करता ही है साथ ही हमारे दिल  को भी चोट  पहुंचाता है .झांसी  की रानी ke  महान  साहस की तुलना किसी से भी करना असंभव  है फिर  इस सूची में जो नाम उनसे ऊपर दिए गए हैं वे तो तुलनात्मक रूप से कहीं ठहरते  ही नहीं .भारत सरकार को इस सम्बन्ध में उचित कदम उठाने चाहिए ताकि आगे से किसी भी देश की कोई भी पत्रिका हमारे आदर्श चरित्रों को अपनी सूची में शामिल करते  समय उचित स्थान दें .
                  शिखा कौशिक
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बुधवार, 27 जुलाई 2011

प्रथम पुरुष स्त्रीवादी-आदिकवि महर्षि वाल्मीकि [2]

प्रथम पुरुष स्त्रीवादी-आदिकवि महर्षि वाल्मीकि [2]
इसी प्रकार के उद्गार महर्षि वाल्मीकि ने उत्तर-कांड  के ''त्रयोदश : सर्ग '' के श्लोक ११ व् १२ में मंदोदरी के पिता राक्षसराज मय के मुख से भी प्रकट करवाएं हैं -
''कन्या पित्र्त्वं......स्थाप्य तिष्ठति ''
[अर्थात -मान की अभिलाषा रखने वाले प्राय: सभी लोगों के लिए कन्या का पिता होना कष्टकारक होता है .कन्या सदा do  कुलो को संशय में डाले रहती है ]
महर्षि वाल्मीकि ने स्त्री के विरुद्ध किये जाने वाले अपराधों को भी स्थान-स्थान पर उद्धृत किया है .आज भी जहाँ 'बलात्कार ''जैसे अमानवीय अपराध को स्त्री की पवित्र -अपवित्रता के साथ jodkar बलात्कृत स्त्री को नारकीय परिस्थितियों में धकेल दिया जाता है उसी व्यथा को महर्षि ने रामायण काल में घटित ''अहल्या -उद्धार-प्रसंग'के माध्यम से उद्घाटित करने का सशक्त प्रयास किया है .''उत्तरकाण्ड 'के 'त्रिंश सर्ग:' के ३९वे व् ४० वे श्लोक में अहल्या अपना पक्ष रखते हुए कहती हैं -
''सा तम प्रसाद्यामास ....कर्तुम्हरसी ''
[अर्थात -विप्रवर !बहम्र्षे! देवराज इंद्र ने आपका ही रूप धारण कर मुझे कलंकित किया है .मैं उसे पहचान न सकी थी .अत: अनजाने में मुझसे यह अपराध हुआ ,स्वेच्छाचारवश  नहीं .इसलिए आपको मुझपर कृपा करनी चाहिए ]
किन्तु अहल्या के पतिदेव गौतम ऋषि उन्हें क्षमा नहीं करते .हजारों वर्षों की तपस्या  के पश्चात् श्री राम द्वारा चरण छूकर उन्हें सम्मानित किये जाने पर अहल्या पुन: पति सामीप्य को प्राप्त करती हैं .
पुरुष-अहम् किस प्रकार स्त्री-जाति के सम्मान को रौंदता आया है -इसका उल्लेख महर्षि वाल्मीकि ने रावन द्वारा रम्भा से बलात्कार,वेदवती के साथ दुर्व्यवहार ,देवताओं की कन्याओं व् स्त्रियों का अपहरण आदि प्रसंगों द्वारा किया है .रावन के इसी प्रकार के पापों का दंड देने के लिए श्री राम व् माता सीता के मनुष्य रूप में अवतार लेने का वर्णन महर्षि ने किया है .
महर्षि वाल्मीकि स्त्री -जाति को सम्मान दिए जाने की वकालत करते हुए अपने आदर्श मर्यादा-पुरषोंतम श्री राम तक को कटघरे में खड़ा कर देते हैं -जब श्री राम भगवती सीता से अयोध्या के  जन समुदाय के समक्ष अपनी शुद्धता प्रमाणित करने के लिए कहते हैं .महर्षि यद्यपि भविष्य दृष्टा  थे किन्तु उन्होंने अपने वचनों द्वारा श्री राम व् अयोध्या के जन समुदाय को संतुष्ट करने का प्रयास भी किया .उन्होंने कहा-
''लोकाप्वादभितास्य .......... तम्नुग्याअह्रसी   ''
[उत्तरकाण्ड षणवतितम: सर्ग: श्लोक -१७ ]
[अर्थात महान व्रतधारी श्री राम !लोकापवाद से डरे हुए आपको सीता अपनी शुद्धता का विश्वास दिलाएगी .इसके लिए आज्ञा दें ]

''इमौ तू .....ब्रवीमि ''[श्लोक-१८]

[अर्थात-ये दोनों कुमार कुश और लव जानकी के गर्भ से जुड़वे पैदा हुए हैं .ये दोनों आपके ही पुत्र हैं और आपके ही सामान दुर्धर्ष वीर हैं ,यह मैं आपको सच्ची बात बता रहा हूँ ]

''प्रचेतसोहहम......पुत्रकौ ''[श्लोक-१९]
''बहुवर्ष ........मैथिली ' [श्लोक २० ]

[अर्थात-रघुकुलनंदन !मैं प्रचेता [वरुण ]का दसवां पुत्र हूँ .मेरे मुह से कभी झूठ बात nikli हो .इसका  मुझे स्मरण  नहीं .मैं सत्य कहता हूँ ये दोनों आपके ही पुत्र हैं [१९].मैंने कई हज़ार वर्षों तक भारी तपस्या की है यदि मिथिलेशकुमारी सीता में कोई भी दोष हो तो मुझे उस तपस्या का फल न मिले (२०) ]
स्पष्ट है कि मानव इतिहास में ऐसा पुरुष ढूढने पर भी नहीं मिलेगा जो पति द्वारा त्यागी गयी,जनसमुदाय   द्वारा लांछित की गयी स्त्री को और उसके  गर्भ में पल  रहे बालकों को न केवल आश्रय देकर सम्पूर्ण समाज से लोहा ले और भरी सभा में अपने द्वारा संचित हजारों वर्षों के पुण्यों को दांव पर ''केवल एक स्त्री की  अस्मिता को पुनर्स्थापित'' करने हेतु लगा दे .महर्षि वाल्मीकि इसी कारण स्त्री -जाति के मूक  मुख में स्वर भरने वाले ;माता के सम्मान हेतु ''लव-कुश '' जैसी संघर्षशील संतानों   के गुरु-समस्त  मानव जाति के इतिहास में प्रथम पुरुष स्त्रीवादी थे -यह मानने में किसी  प्रकार की शंका व्यक्त नहीं की जानी चाहिए . 

[शोध ग्रन्थ  -श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण :गीताप्रेस गोरखपुर संवत -२०६३] 
शिखा कौशिक

रविवार, 24 जुलाई 2011

प्रथम पुरुष स्त्रीवादी :आदिकवि वाल्मीकि

प्रथम पुरुष स्त्रीवादी :आदिकवि वाल्मीकि

भूतल के प्रथम काव्य ''रामायण '' के रचनाकार श्री वाल्मीकि ने अपने इस वेदतुल्य आदिकाव्य ''रामायण'' द्वारा न केवल मर्यादा मूर्ति  श्री राम के चरित्र की रचना की बल्कि तत्कालीन समाज में स्त्री -जीवन की समस्याओं का यथार्थ चित्रण भी किया है .न केवल एक रचनाकार के रूप में वरन स्वयं ''रामायण'' के ''उत्तरकाण्ड '' के ''षणवतित्म: [९६ ] ''सर्ग में सीता की शुद्धता का समर्थन करते हुए-उन्होंने यह सिद्ध किया है कि वह सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में प्रथम पुरुष स्त्रीवादी थे .पश्चिम से नारीवाद की उत्पत्ति बतलाने वाले विद्वान भी यदि ''रामायण ''में महर्षि वाल्मीकि द्वारा चित्रित स्त्री जाति की समस्याओं ,स्त्री संघर्ष ,स्त्री -चेतना का अध्ययन करें तो निश्चित रूप से वे भी यह मानने के लिए बाध्य होंगे कि जितना प्राचीन विश्व का इतिहास है utna ही प्राचीन है -स्त्री जाति के संघर्ष का इतिहास -वह स्त्री चाहे देव योनि की हो अथवा राक्षस जाति की .
                 ''स्त्री जाति की हीन दशा ''वर्तमान में जितना बड़ा बहस का मुद्दा बन चुका है ,उसे उठाने का shery  महर्षि वाल्मीकि को ही जाता है .राजा दशरथ के पुत्र -प्राप्ति हेतु लालायित होने को महर्षि इस श्लोक के द्वारा उकेरते हैं -
    ''तस्य चैवंप्रभावस्य ............''[बालकाण्डे ;अष्टम:सर्ग:;
श्लोक-१]  अर्थात सम्पूर्ण धर्मो को जानने वाले महात्मा दशरथ ऐसे प्रभावशाली होते हुए भी पुत्रों के लिए सदा चिंतित रहते थे .उनके वंश को चलाने वाला कोई पुत्र नहीं था .]''

               स्त्री की हीन दशा का मुख्य कारक जहाँ यह था कि पुत्री को वंश चलाने वाला नहीं माना जाता था वही पुरुष-प्रधान समाज में कन्या का पिता hona भी अपमानजनक माना जाने लगा था .महर्षि वाल्मीकि भगवती सीता के मुख से इसी तथ्य को उद्घाटित करते हुए लिखते हैं-
          
     'सदृशाच्चापकृष्ताच्च ........''[अयोध्याकांडे अष्टादशाधिकशततम:
सर्ग: ,श्लोक -३५ ][अर्थात संसार में कन्या के पिता को ,वह भूतल पर इंद्र के तुल्य क्यों न हो ,वर पक्ष के लोंगों से ,वे समान या अपने से छोटी हैसियत के ही क्यों न हों ,प्राय: अपमान उठाना पड़ता है ]
                  
                          [शेष अगली पोस्ट में ]
              शिखा कौशिक