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सोमवार, 20 दिसंबर 2010

एक नया सनकपन...

जातिवाद एक ऐसा शब्द है जो शायद भारत में कभी गैर-प्रासंगिक नहीं हो पायेगा .सात समुन्द्र पार तक अपनी मेधा क़ा लोहा मनवाने वाले हम भारतीय आज भी कितने संकुचित दायरे में सिमटे हुए हैं उसका उदहारण है आप सभी के घर के बाहर से आते -जाते ''वाहन'' .इन पर आगे या पीछे ध्यान  से देखिएगा चलाने  वाले  की जाति क़ा नाम लिखा होगा .हमारे क्षेत्र में तो ये फैशन काफी चल रहा है .किसी पर लिखा है -गुर्जर ,तो किसी पर -जैन ,नामदेव ,सैनी आदि  .बहुत समय से ये तो देखते आये थे कि रोब ग़ालिब करने के लिए गाड़ियों  व् बाइक्स  पर -पुलिस ,प्रेस आदि  तो लिखा रहता था किन्तु इस नए सनकपन क़ा क्या कीजिये ?क्या यह वही नयी पीढ़ी है जो प्रेम के नाम पर धर्म  व् जाति की दीवारें तोड़ डालने के लिए तो अति उत्सुक है पर मन में अब भी अपनी जाति के गर्व को सजाये बैठी है .ये नए भारत को किस नयी दिशा में ले जायेगे इस पर विचार करने की भी जरूरत है .मैं तो इन सनकियों से इतना ही कहना चाहूंगी कि हम सबसे पहले हिन्दुस्तानी है और उससे भी पहले एक इंसान .जातियों में न बटे  और न बांटे  .वाहनों पर लिखवाना ही है तो ''हिन्दुस्तानी ''ही लिखवाएं .देखिये  फिर  कितने गौरव  की अनुभूति  होती है  !

13 टिप्‍पणियां:

Harman ने कहा…

mai aapse biklul sahmat hun, jaati ya dharam to insaan ke diye hue naam hai, asal mein to sabhi ek se hi hai..

mere blog par bhi kabhi aaiye
Lyrics Mantra

JAGDISH BALI ने कहा…

Perhaps it will take time. In fact, the benefits being given in the name of caste is one of the impediments in the way. anyway I shun this practice.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पारखी नज़र है ... सच कहा .. पहले हिन्दुस्तानी तो बन जाएँ हम ...

shalini kaushik ने कहा…

ise sanak hi kahajayega kintu aaj jatiya hi desh chala rahi hain phir bhala vahan chala liya to kya fark pad gaya ?achchhi post .badhai .

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

शिखा जी,
पता नहीं कब हम इस जातिवाद के दल दल से निकल पायेंगे !
आपका पोस्ट पढ़कर लग रहा है कि स्थिति और भी विकट होती जा रही है !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

ZEAL ने कहा…

बहुत सही बात लिखी है आपने। सहमत हूँ आपसे।
आभार।

सहज साहित्य ने कहा…

शिखा बेटी अच्छे विचार हैं। लिखते जाओ । हाँ सनकपन के स्थान पर सनक ही पर्याप्त है ।
rdkamboj@gmail.com

रंजना ने कहा…

दुनियां में ऐसा कुछ नहीं जिसका उपयोग केवल एक ही अर्थ में किया जा सके...

वस्तुतः सकारात्मक या नकारात्मक उद्देश्य ही पाक या पाप बनाती है किसी भी चीज को...

जाती,धर्म,भाषा इत्यादि इत्यादि भी इस परिधि से बाहर नहीं ....

Rahul Singh ने कहा…

जाति की नकारात्‍मक संकीर्णता अधिक खतरनाक है.

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज ।
बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 15/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

bahut sunder vichar ...
15-aug.ki shubhkamnayen...!!
http://anupamassukrity.blogspot.com/

prerna argal ने कहा…

बिलकुल सही कहा जातिवाद कम नहीं हो रहा बल्कि और बढ़ ही रहा है /हम ये भूल गए हैं की पहले हम हिन्दुस्तानी हैं फिर कुछ और / यथार्थ को बताती हुई सार्थक रचना /बधाई आपको /
ब्लोगर्स मीट वीकली (४)के मंच पर आपका स्वागत है आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/आभार/ इसका लिंक हैhttp://hbfint.blogspot.com/2011/08/4-happy-independence-day-india.htmlधन्यवाद /