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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

                                   शोध -पत्र 
  वैवाहिक जीवन में क्रूरता का हिंदी महिला उपन्यासकारों द्वारा चित्रण 
                    [उत्तर-आधुनिककालीन हिंदी महिला उपन्यासकारों के विशेष सन्दर्भ में ]



विषय-प्रवेश -भारतवर्ष में 'भारतीय दंड संहिता ' की धारा '498 -क'में पति या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता को परिभाषित कर दंडनीय अपराध घोषित किया गया है व  हिन्दू-विवाह अधिनियम के अंतर्गत 'क्रूरता' को [पति -पत्नी के परस्पर व्यवहार में क्रूरता ] विवाह-विच्छेद का एक आधार माना गया है |विधि-विशेषज्ञ डॉ पारस दीवान के अनुसार -''क्रूरता संप्रत्यय प्रत्येक काल में और प्रत्येक समाज में भिन्न-भिन्न रहा है | सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ-साथ उसके अर्थ में भी परिवर्तन होते रहे हैं |--------क्रूरता की भारतीय व्याख्या और पश्चिमी व्याख्या में अंतर होना स्वाभाविक है |हमारी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां वहां से नितांत भिन्न हैं |भारतीय समाज का सबसे विशिष्ट तथ्य है -संयुक्त परिवार -व्यवस्था | अधिकांश युगल आज भी संयुक्त परिवार में रहते हैं |-----अतः क्रूरता के भारतीय व्याख्या अपने ढंग की हो तो आश्चर्य की कुछ बात नहीं है |''1[आधुनिक हिन्दू विधि की रूप रेखा -डॉ पारस दीवान ,इलाहाबाद लॉ एजेंसी पब्लिकेशन ,तीसवां संस्करण:२०१४,पृष्ठ- ११३]
                                                                        उत्तर-आधुनिककालीन हिंदी की महिला उपन्यासकारों ने वैवाहिक जीवन की क्रूरताओं के अनेक चित्र अपने उपन्यासों में उकेरे हैं |वर्तमान में जहाँ भारतीय संयुक्त परिवार टूटकर अणु-परमाणु परिवारों में रूपांतरित हो रहे हैं , वहां वैवाहिक जीवन में क्रूरता के अनेकों वीभत्स रूप नित्य ही संज्ञान में आ रहे हैं |उत्तर-आधुनिककालीन कथा-तत्व में यथार्थ की अभिव्यक्ति प्रमुख रही है और चूंकि वैवाहिक जीवन की क्रूरता पूर्व में भले ही दबे-छिपे रूप में प्रकट होती रही हो पर उत्तर-आधुनिककालीन महिला उपन्यासकारों ने सच्चाई व् गहराई के साथ अपने उपन्यासों में इसे खुलकर निरूपित किया है |

*भारतीय कानून में ' क्रूरता ' की परिभाषा -

-  भारतीय दंड संहिता की धारा 498 -क  के अंतर्गत किसी स्त्री के पति या पति के नातेदारों द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना परिभाषित किया गया है -
*498 -क    - जो कोई , किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए , ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा , वह कारावास से , जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी , दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा | 2  [भारतीय दंड संहिता -रतनलाल तथा धीरजलाल ,पृष्ठ -1541 ,संस्करण -चौंतीसवां ,2016 ]
      इस धारा के अंतर्गत 'क्रूरता ' से तात्पर्य ऐसे व्यवहार से है जिससे उस स्त्री के जीवन को [शारीरिक अथवा मानसिक रूप से ] गंभीर हानि या संकट उत्पन्न होने की सम्भावना हो , उस स्त्री को आत्महत्या के लिए उकसाया गया हो | इसके अतिरिक्त ससुरालवालों द्वारा स्त्री या उसके नातेदारों से संपत्ति अथवा मूल्यवान की मांग करना ,मांग पूरी न होने पर स्त्री को प्रताड़ित आदि भी इस धारा के अंतर्गत 'क्रूरता ' माना गया |
*113 -क - किसी विवाहिता स्त्री द्वारा आत्महत्या के दुष्प्रेरण के सम्बन्ध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम में यह धारा बढ़ा दी गयी | जब प्रश्न यह उपस्थित हो कि किसी विवाहिता स्त्री द्वारा आत्महत्या करना उसके पति या उसके पति के नातेदारों द्वारा दुष्प्रेरित किया गया हो और विवाह हुए सात वर्ष की समय सीमा के अंदर स्त्री ने आत्महत्या की हो तब न्यायालय परिस्थितियों को मद्देनज़र रखते हुए ये उपधारणा कर सकेगा कि स्त्री द्वारा की गयी ऐसी आत्महत्या उसके पति अथवा पति के सम्बन्धियों द्वारा दुष्प्रेरित की गई थी |

-हिन्दू विवाह अधिनियम  में 'क्रूरता ' को 'विवाह-विच्छेद ' का एक आधार माना गया है | यद्यपि हिन्दू विवाह अधिनियम में अभिव्यक्ति 'क्रूरता 'को परिभाषित नहीं किया गया है बल्कि इसे वैवाहिक त्रुटियों के अंतर्गत रखा गया है | ये मानसिक व् शारीरिक दोनों रूप में हो सकती है | '' यदि पति या पत्नी का व्यवहार ऐसा है कि इसमें दूसरे पक्षकार के मन में अपने कल्याण के बारे में यह आशंका उत्पन्न कर देता है तब ऐसा आचरण 'क्रूरता ' की कोटि में आता है | विवाह जैसे संवेदनशील मानवीय संबंधों में , किसी भी व्यक्ति को मामले की सम्भाव्यताओं पर विचार करना होता है | ''3 [आधुनिक हिन्दू विधि की रूपरेखा -डॉ पारस दीवान ,पृष्ठ -113 ]
   स्पष्ट है  कि 'क्रूरता ' का निर्णय वैवाहिक जीवन के पूर्ण मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है | क्रूरता शारीरिक व् मानसिक हो सकती है | ऐसा प्रत्येक मानवीय आचरण या मानवीय व्यवहार जो दूसरे पक्षकार पर प्रतिकूल प्रभाव कारित करता हो -क्रूरता है |
        शारीरिक क्रूरता  के निर्धारण में तो न्यायलय को कोई कठिनाई नहीं आती है किन्तु मानसिक क्रूरता के अंतर्गत निम्न बिंदुओं पर विचार किया जाता है -

*मानसिक क्लेश एवं उत्पीड़न पहुंचाने वाले आचरण की निरंतरता अधिनियम की धारा 10 के अंतर्गत क्रूरता का गठन कर सकते हैं | मानसिक क्रूरता में ऐसी मौखिक रूप से दी गयी गालियां और गन्दी -गन्दी भाषाओं में बेइज्जती सम्मिलित हो सकती है जिससे दूसरे पक्षकार की मानसिक शांति में निरंतर दखल उत्पन्न हो जाता है | 4 [विधि निर्णय एवं सामयिकी 53 एस सी ]

*क्रूरता का निर्धारण करते समय पति -पत्नी के व्यवहार में आये मनोवैज्ञानिक बदलावों , मस्तिष्क में पीड़ा उत्पन्न करने वाले आचरण की गंभीरता का गहन मंथन करना न्यायालय का कार्य है |

*चूंकि वैवाहिक जीवन की नींव सहनशक्ति ,सामंजस्य व् सहयोग -सम्मान जैसे मूल्यों पर टिकी होती है अतः क्रूरता का निर्धारण करते समय न्यायलय दिन प्रतिदिन के सामान्य झगड़ों को इसका आधार नहीं बना सकता है | इस सम्बन्ध में पक्षकारों के शारीरिक व् मानसिक दशाओं ,उनके चरित्र तथा सामाजिक स्थिति को आधार बनाते हुए क्रूरता का निर्णय किया जाता है |

* ' वैवाहिक जीवन में क्रूरता बिना किसी आधार के भी हो सकती है जो गूढ़ या जघन्य हो सकती है | यह शब्दों , हाव -भाव  या मात्र चुप्पी , हिंसात्मक या अहिंसात्मक हो सकती है | 5 [विधि निर्णय एवं सामयिकी ,नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली ,२००६ [40 ] ए आई सी 1 ]

* वैवाहिक -जीवन में क्रूरता व् हिंदी -महिला उपन्यासकारों द्वारा चित्रण -
  क्रूरता की परिभाषा व् उनमें अन्तर्निहित तथ्यों के द्वारा यह स्पष्ट होता है कि वैवाहिक जीवन में 'क्रूरता '' का अध्ययन व् हिंदी -महिला उपन्यासकारों द्वारा उनके चित्रण का  निम्न बिंदुओं के अंतर्गत अनुशीलन किया जा सकता है -

*आत्महत्या हेतु दुष्प्रेरण -
    किसी विवाहिता स्त्री अथवा पुरुष द्वारा पति अथवा पत्नी व् उसके नातेदारों द्वारा उत्पीड़न के कारण आत्महत्या करना  [ स्त्री के सम्बन्ध में दहेज़ प्रथा से सम्बंधित उत्पीड़न विशेष रूप से ] वैवाहिक क्रूरता का सबसे प्रमुख रूप है | प्रसिद्ध महिला उपन्यासकार अलका सरावगी ने अपने उपन्यास ''शेष कादंबरी '' में मुख्य पात्र रूबी दी के माध्यम से ऐसी ही विषम परिस्थिति का चित्रण किया है | सत पीढ़िया शाह परिवार की गोद ली गयी रूबी दी का विवाह साधारण परिवार के सुधीर के साथ होता है | ससुराल वाले लालची हैं और इस कारण रूबी दी का निरंतर उत्पीड़न किया जाता है | ससुरालवालों की प्रताड़ना के कारण रूबी दी शारीरिक व् मानसिक रूप से बीमार हो जाती हैं | उनकी गंभीर अवस्था का चित्रण करते हुए उपन्यासकार लिखती हैं -
''डॉ डेविस जैसे नामी चिकित्सक के मुंह से रूबी के लिए 'सीरियसली इल ' सुनकर सुधीर सचमुच घबरा गए थे | वे जानते थे कि रूबी ने बहुत कुछ सहा है | --------------------- पर डॉ से रूबी के लिए 'हाइली सुसाइडल '-गंभीर रूप से आत्महत्या की प्रवर्ति लिए -सुनकर सुधीर दंग रह गए थे | बात यहाँ तक पहुँच गयी और उन्होंने कभी ध्यान तक नहीं दिया इसकी किसी बात  पर | बेचारी अकेली सहती रही - न जाने क्या-क्या | कुछ कहती भी तो नहीं आजकल | शुरू शुरू में शिकायतें  करती थी , उसे दूध न दिए जाने का किस्सा उन्हें मालूम है | पर शायद उनके रूखेपन के कारण ही अब चुप लगा जाती है | ''[ शेष कादम्बरी -अलका सरावगी ,पृष्ठ -89 -90 ,संस्करण -2004 ,राजकमल प्रकाशन ]
आकड़ों के अनुसार प्रतिदिन इक्कीस महिलाएं अपना जीवन गँवा देती हैं -
                                    ''The National Crime Records Bureau (NCRB) states that in 2015, as many as 7,634 women died in the country due to dowry harassment. Either they were burnt alive or forced to commit suicide over dowry demand.''[ इंडिया टुडे मैगज़ीन ]
 
                                     

*जीवन की मूल आवश्यकताओं से वंचित रखने की क्रूरता - 
पति-पत्नी के बीच जीवन की मूल आवश्यकताओं से वंचित रखने जैसी क्रूरता के दर्शन भी सामान्यतः हो जाते हैं . उत्तर-आधुनिक हिंदी की महिला उपंन्यासकारो ने बहुत सूक्ष्मता के साथ इसका चित्रण किया है . आधुनिक नारी के लिए रोटी-कपड़ा और मकान की साथ-साथ अपने अस्तित्व की पहचान बनाना भी मूल आवश्यकताओं में सम्मिलित है .चित्रा मुद्गल के उपन्यास -' एक ज़मीन अपनी ' की अंकिता और सुधांशु ने प्रेम विवाह किया था . किन्तु '' मुश्किल से तीन साल साथ रह पाये वे ....'' अंकिता द्वारा सुधांशु को उसके गलत आचरण पर टोकने एवं अपने लिए ये कहने पर -'' मैं सिर्फ गृहिणी ही नहीं हूँ.... एक स्त्री भी हूं... जो पढ़ना चाहती हूं पढ़ सकूं.... लिखना चाहती हूं लिख सकूं?.... लो इसी वक्त यह रिश्ता खत्म. 'उसने अपनी कलाइयों की चूड़ियां झन्न से फर्श पर उछाल दी थी.... सुधांशु पगलाए सांड सा टूट पड़ा था उस पर,' रस्साली रंडी... यही तो तेरा असली रूप है... प्रोफेसर बनना चाहती है, तू कभी नहीं बन सकेगी... कभी नहीं... "सुधांशु ने उसकी कविताओं की कॉपी चिथड़े - चिथड़े कर कूड़ेदान में फेंक दी थी. वह फटी - फटी आंखों से उन चिथड़ों को घूरती रही..... सुबह आईने में चेहरा अपना होने से इंकार कर रहा था. दाहिनी आंख सूजकर गूलर हो उठी थी, निचला होंठ कटकर फटे गुब्बारे से फुलाई गई पुटकी सा सुआ आया था. "" (एक जमीन अपनी :चित्रा मुद्गल, पृष्ठ - 15)
शेष कादंबरी उपन्यास में रूबी दी को तो ससुराल में दूध तक पीने के लिए नहीं मिल पाता.


*पर स्त्री -पुरुष से सम्बन्ध रखने रुपी क्रूरता -

पति /पत्नी के रहते दूसरे पुरुष / स्त्री से संबंध बनाने की क्रूरता वास्तव में वैवाहिक जीवन में जहर घोल देती है. मंजुल भगत के उपन्यास 'अनारो' में निम्न आय वर्ग की अनारो का पति नंदलाल स्वयं तो दूसरी स्त्री छबीली को लाकर उसकी छाती पर रख देता है और जब अनारो की बेटी का विवाह होता है तब दामाद भी दूसरी स्त्री के चक्कर में उसकी बेटी का जीवन बर्बाद करने लगता है.
एक जमीन अपनी- का विवाहित सुधीर गुप्ता मॉडल नीता से अंतरंग संबंध बनाता है और बिना विवाह के नीता उसकी बच्ची की मां बनती है. पत्नी के प्रति इससे बढ़कर क्रूरता और क्या हो सकती है!!!
पीली आंधी (प्रभा खेतान) - में पति के सम लैंगिक होने के कारण बच्चे की चाह में पत्नी सोमा सुजीत से संबंध बनाती है जिसके कारण उसका अपना परिवार तो टूटता ही है, सुजीत की पत्नी चित्रा को भी चार साल की बेटी के साथ घर छोड़कर जाना पड़ता है.
चाक - (मैत्रेयी पुष्पा) की सारंग भी पति रंजीत के होते हुए श्री धर मास्टर से संबंध बनाती है.
मीना शर्मा के उपन्यास 'अनाम प्रसंग' में भी विवाहित पुरुष के अन्य स्त्री से संबंध का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है.
गीतांजलि श्री के माई व शशि प्रभा शास्त्री के उपन्यास 'नावें में भी दूसरी स्त्री से विवाहित पुरूष के संबंध का चित्रण कर वैवाहिक जीवन में की जाने वाली क्रूरता को दर्शाया गया है.

*पुत्री -जन्म पर प्रताड़ित करने सम्बन्धी क्रूरता -

पुत्री को जन्म देना भी वैवाहिक जीवन में कटुता उत्पन्न कर देता है. पुत्री को जन्म देने वाली पत्नी - बहू को पति व ससुराल वालों की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है. चौदह फेरे - में पति कर्नल तो पत्नी नन्दी को अपमानित करता ही रहता है ऊपर से नंदी द्वारा पुत्री को जन्म देने पर - 'पंडित के मंत्रों के बीच ही उग्र पितामह की गालियों का क्रम चालू था :शिबिया के पल्ले नहान की परदेशिन पड़ी, अपने कुमाऊं की छोरी होती तो पहलौठी में ही दन्न से बेटा जनती.... इस साली ने खानदान की रीत बिगाड़ दी पहले पहल चेहड़ी, देखता हूं हरवंश का पाठ कराना होगा. "
इनके अलावा संयुक्त परिवार से अलग रहने सम्बन्धी क्रूरता,पति -पत्नी का परस्पर ताना देना  रुपी क्रूरता, द्विविवाह रुपी क्रूरता, सतीत्व पर प्रहार रुपी क्रूरता, बदला लेने की भावना से तंग करने वाली मुकदमेबाज़ी द्वारा क्रूरता करना आदि वैवाहिक जीवन में पति - पत्नी, ससुराल वालों के द्वारा की जाने वाली क्रूरतायें है जिनका उत्तर आधुनिक कालीन महिला उपन्यासकारों ने यथार्थ चित्रण किया है. यद्यपि सामाजिक परिदृश्य अभी निराशा से युक्त है क्योंकि स्त्री बहुत कुछ क्रूरतायें सहते हुए अपने कानूनी अधिकारों का प्रयोग करने हेतु न तो सक्षम है और न ही चैतन्य.