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शुक्रवार, 19 मई 2017

शोध - विषय - " चुनावी हिंदी - हिंदी भाषा का नवीन स्वरूप" - डॉ शिखा कौशिक

शोध - विषय - " चुनावी हिंदी - हिंदी भाषा का नवीन स्वरूप"      - डॉ शिखा कौशिक

अरस्तू से लेकर आज तक अनेक राजनीतिक विचारकों ने शासन का सञ्चालन करने वाली अनेक प्रणालियों अथवा सरकारों के रूपों के सम्बन्ध में विभिन्न मत प्रस्तुत किये हैं ; जिनमें प्रमुख हैं -
राजतन्त्र , अधिनायक तंत्र या तानाशाही , कुलीनतंत्र , प्रजातंत्र या लोकतंत्र , संसदात्मक शासन प्रणाली , अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली , एकात्मक शासन-प्रणाली , संघात्मक शासन-प्रणाली आदि .
                  इन सभी शासन प्रणालियों में से  आधुनिक युग में प्रजातंत्र  अथवा लोकतंत्र को सर्वश्रेष्ठ शासन -प्रणाली माना जाता है . प्रजातंत्र में शासन सत्ता जनता के प्रतिनिधियों के हाथ में रहती है . इसीलिए प्रजातंत्र में चुनाव का व्यापक महत्व है .प्रजातंत्र में शासन सत्ता की प्राप्ति का एकमात्र साधन चुनाव हैं .चुनाव जीतनें के लिए विभिन्न राजनीतिक दल  अपने कार्यक्रमों एवम नीतियों का प्रचार-प्रसार करके जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं और विजयी होने पर सरकार बनाकर शासन-सत्ता ग्रहण करते हैं . चुनाव ही प्रजातंत्र का आधार होता है .1
                15  अगस्त 1947  को ब्रिटिश शासन की गुलामी से आजाद होने के पश्चात् 26  जनवरी 1950  को भारत  का संविधान पूरे देश में  [जम्मू-  कश्मीर राज्य को छोड़कर  ] लागू किया गया  .,जिसमें भारत को ' लोकतंत्रात्मक संघात्मक गणराज्य ' घोषित किया गया अर्थात भारत  में लोकतंत्र शासन की स्थापना की गयी ,जिसके अन्तर्गत देश का शासन ' जनता का  , जनता के लिए तथा जनता द्वारा किये जाने की घोषणा की गयी .संघात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत शक्तियों का विभाजन केंद्र व् राज्यों के बीच किया गया ..
       केंद्रीय शासन के अन्तर्गत  भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया . भारत की संसद राष्ट्रपति ,राज्य -सभा तथा लोक-सभा से मिलकर बनती है .राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है तथा राज्य-सभा स्थाई सदन है और प्रधानमंत्री व् उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है जो लोकसभा के गठन के लिए होने वाले चुनावों द्वारा चुनकर आते हैं ; बहुमत दल के चुने हुए सांसद ही अपने में से किसी को प्रधानमंत्री चुनते हैं .
        लोक-सभा के सदस्यों का निर्वाचन वयस्क-मताधिकार [18  वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को मताधिकार है ] के आधार पर राज्य की जनता द्वारा किया जाता है .इसी प्रकार  राज्यों की व्यवस्थापिका राज्यपाल व् द्विसदनीय विधान-मंडल से मिलकर बनती है .जहाँ निचला-सदन विधान सभा व् उच्च सदन विधान परिषद् होती है .विधान-सभा के सदस्यों का निर्वाचन भी वयस्क -मताधिकार के आधार पर किया जाता है .इस प्रकार लोकतंत्र को वास्तविक रूप प्रदान करने का श्रेय चुनावों को ही जाता है ,जिनसे सम्बंधित कार्यों का सञ्चालन चुनाव -आयोग करता है .यह भी हम भारतवासियों के लिए गर्व का विषय है कि  भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है .लोकतंत्र के आधार रूप इन चुनावों अथवा  निर्वाचनों में भारत में राष्ट्र भाषा के पद पर विराजमान हिंदी भाषा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योंकि भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा एक प्राणी अपने भावों व् विचारों को दूसरों तक पहुँचाता है . ''आज भारत में यूँ तो 826  भाषाएँ प्रयुक्त की जाती हैं ,मगर इनमें सर्वोपरि ,सर्वप्रधान और सर्वव्यापक भाषा हिंदी ही है .''2
         कई विरोधों के बावजूद हिंदी के महत्त्व और भारतीय जनता के हिंदी के प्रति लगाव के कारण ही सं १९५० में भारतीय -संविधान [धारा 343 :1 ]में स्पष्टतया स्वीकार किया गया है कि ' संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी .'' इसी हिंदी भाषा में जनता से संवाद स्थापित कर कितने ही राजनैतिक दलों ने सत्ता का सुख भोगा और कई अहिन्दी राज्यों  में हिंदी का विरोध कर कई राजनैतिक दल सत्तारूढ़ हुए . उदाहरण के लिए तमिलनाडु की राजनीति तो जैसे हिंदी - विरोध के आस - पास ही सिमटकर रही है -

"The Anti-Hindi imposition agitations of Tamil Nadu were a series of agitations that happened in the Indian state of Tamil Nadu (formerly Madras State and part of Madras Presidency) during both pre- and post-Independence periods. The agitations involved several mass protests, riots, student and political movements in Tamil Nadu concerning the official status of Hindi in the state.

The first anti-Hindi imposition agitation was launched in 1937, in opposition to the introduction of compulsory teaching of Hindi in the schools of Madras Presidency by the first Indian National Congress government led by C. Rajagopalachari (Rajaji). This move was immediately opposed by E. V. Ramasamy (Periyar) and the opposition [Justice Party (India)|Justice Party] (later Dravidar Kazhagam). The agitation, which lasted three years, was multifaceted and involved fasts, conferences, marches, picketing and protests. The government responded with a crackdown resulting in the death of two protesters and the arrest of 1,198 persons including women and children. Mandatory Hindi education was later withdrawn by the British Governor of Madras Lord Erskine in February 1940 after the resignation of the Congress Government in 1939.

The adoption of an official language for the Indian Republic was a hotly debated issue during the framing of the Indian Constitution after India's independence from the United Kingdom. After an exhaustive and divisive debate, Hindi was adopted as the official language of India with English continuing as an associate official language for a period of fifteen years, after which Hindi would become the sole official language. The new Constitution came into effect on 26 January 1950. Efforts by the Indian Government to make Hindi the sole official language after 1965 were not acceptable to many non-Hindi Indian states, who wanted the continued use of English. The Dravida Munnetra Kazhagam (DMK), a descendant of Dravidar Kazhagam, led the opposition to Hindi. To
allay their fears, Prime Minister Jawaharlal Nehru enacted the Official Languages Act in 1963 to ensure the continuing use of English beyond 1965. The text of the Act did not satisfy the DMK and increased their skepticism that his assurances might not be honoured by future administrations.

As the day (26 January 1965) of switching over to Hindi as sole official language approached, the anti-Hindi movement gained momentum in Madras State with increased support from college students. On 25 January, a full-scale riot broke out in the southern city of Madurai, sparked off by a minor altercation between agitating students and Congress party members. The riots spread all over Madras State, continued unabated for the next two months, and were marked by acts of violence, arson, looting, police firing and lathi charges. The Congress Government of the Madras State, called in paramilitary forces to quell the agitation; their involvement resulted in the deaths of about seventy persons (by official estimates) including two policemen. To calm the situation, Indian Prime Minister Lal Bahadur Shastri gave assurances that English would continue to be used as the official language as long as the non-Hindi speaking states wanted. The riots subsided after Shastri's assurance, as did the student agitation.

The agitations of 1965 led to major political changes in the state. The DMK won the 1967 assembly election and the Congress Party never managed to recapture power in the state since then. The Official Languages Act was eventually amended in 1967 by the Congress Government headed by Indira Gandhi to guarantee the indefinite use of Hindi and English as official languages. This effectively ensured the current "virtual indefinite policy of bilingualism" of the Indian Republic. There were also two similar (but smaller) agitations in 1968 and 1986 which had varying degrees of success."2
राजनीतिक दल [ जिनके लिए प्रो.मुनरो ने यहाँ तक लिखा है कि -''स्वतंत्र राजनैतिक दल ही प्रजातंत्र का दूसरा नाम हैं .''] चुनावों में हिंदी भाषा का प्रयोग कर उसको क्या स्वरुप प्रदान कर रहे हैं ,ये आज चिंतन का गंभीर मुद्दा है .विभिन्न बिंदुओं के अन्तर्गत हम इसका विश्लेषण व् विवेचन कर सकते हैं -
अ-हिंदी भाषा में चुनाव अथवा निर्वाचन से सम्बंधित महत्वपूर्ण शब्दावली -
*प्रजातंत्र अथवा लोकतंत्र- जनतंत्र का प्रयोग भी प्रजातंत्र  के लिए किया जाता है   . ' लोकतंत्र अंग्रेजी के डेमोक्रेसी शब्द का हिंदी अनुवाद है . डेमोक्रेसी शब्द यूनानी भाषा के दो  शब्दों से मिलकर बना है -'डेमास' का अर्थ है जनता और 'क्रेसिया ' का अर्थ शासन होता है .इसप्रकार लोकतंत्र का अर्थ जनता का शासन हुआ .''3
*जनमत- जनमत का सामान्य अर्थ है -जनता का मत या विचार .
*चुनाव  अथवा निर्वाचन -प्रजातंत्र में शासन सत्ता  की प्राप्ति  का एकमात्र साधन  चुनाव है .चुनाव से तात्पर्य है -''पद के लिए उम्मीदवारों में से बहुमत के आधार पर चुनना .'' निर्वाचन से भी यही तात्पर्य है-' वोट द्वारा चुनाव करना .''
* निर्वाचन-आयोग- भारत में निर्वाचन संबंधी कार्यों का सञ्चालन निर्वाचन अथवा चुनाव आयोग के द्वारा सम्पादित होता है . केंद्र व् राज्यों के पृथक -पृथक निर्वाचन आयोग होते हैं .
* मतदाता -जिस नागरिक को चुनाव में मत देने का अधिकार प्राप्त हो ,उसे मतदाता कहते है .
*वयस्क-मताधिकार-''वयस्क-मताधिकार का आशय यह है की पागल, दिवालिया व् कुछ विशेष अयोग्यताओं को रखने वाले व्यक्ति को छोड़कर सभी स्त्री-पुरुषों को मताधिकार प्राप्त हो .भारत में संसद व् विधान-मंडलों के चुनावों में मताधिकार की आयु 62वें संविधान-संशोधन द्वारा 18वर्ष निश्चित की गयी है .उत्तर-प्रदेश में स्थानीय संस्थाओं के सदस्यों के निर्वाचन के लिए मताधिकार की आयु 18 वर्ष ही है .4
* चुनाव-चिन्ह-प्रत्येक राजनीतिक दल का एक  पंजीकृत चिन्ह  होता है . निर्दलीय उम्मीदवारों को पृथक चुनाव-चिन्ह आवंटित किये जाते हैं.राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में जैसे कांग्रेस का 'हाथ का पंजा' व् भारतीय जनता पार्टी का ' कमल का फूल '' आदि पंजीकृत चुनाव-चिन्ह हैं .
*ई.वी.एम्.-  वर्तमान में मतदान हेतु 'इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ' का प्रयोग किया जाता है ,जिसे संक्षेप में ई.वी.एम्. कहकर संबोधित करते हैं .
*मत-पत्र-  प्रत्येक मतदाता को मतदान हेतु एक ऐसा कागज दिया जाता है जिसमें सभी प्रत्याशियों के चुनाव-चिन्ह व् नाम मुद्रित होते हैं ,इस कागज को ही 'मत-पत्र' कहते हैं .
*मतदान-प्रणाली- प्रजातंत्र में प्रतिनिधियों का निर्वाचन जिस विधि से किया जाता है ,उसे मतदान प्रणाली कहते हैं .भारत में निर्वाचन -आयोग का अध्यक्ष अथवा चुनाव आयुक्त चुनाव संबंधी प्रक्रियाओं का सञ्चालन करता है .'' चुनाव की विभिन्न प्रक्रियाओं का विवरण निम्नवत है -
1-निर्वाचन -क्षेत्रों का निर्धारण- सर्वप्रथम चुनाव-आयोग जनसँख्या के आधार पर प्रतिनिधियों के लिए निर्वाचन -क्षेत्रों का निर्धारण करता है .
2 - मतदाता-सूची का निर्माण - चुनाव आयोग मतदान क्षेत्र के मतदाताओं की सूची का निर्माण कराता है और अंतिम संशोधित सूची को तैयार करवाकर प्रकाशित करवाता है .
3 -चुनाव की घोषणा- चुनाव संबंधी तैयारियां पूरी होने पर सरकार चुनाव संबंधी आवश्यक तिथियों की विधिवत घोषणा कर देती है .इसके साथ नामांकन  -पत्र प्रस्तुत करने , उसकी जाँच करने , नाम वापस लेने आदि की प्रक्रियाएं संपन्न होती हैं .
4 - प्रत्याशियों का नामांकन- एक निश्चित तिथि तक चुनाव में भाग लेने वाले सभी प्रत्याशी अपना नामांकन-पत्र भर  कर जमा  कर देते हैं .
5 -नामांकन -पत्रों की जाँच - निर्धारित समय में नामांकन पत्रों की चुनाव-आयोग द्वारा जांच कराई जाती है और अशुद्ध व् अपूर्ण नामांकन-पत्रों को रद्द  कर दिया जाता है .
6 -नामांकन-पत्रों की वापसी-निर्धारित तिथि तक चुनाव न लड़ने की इच्छा होने पर प्रत्याशी अपना नामांकन-पत्र वापस ले सकते हैं .
7-चुनाव-चिह्नों का वितरण-जो प्रत्याशी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ते हैं , उन्हें चुनाव आयोग चुनाव-चिन्ह वितरित करता है .
8 -मतपत्रों का अथवा ई.वी.एम्.पर प्रकाशन- स्वीकृत नामांकन-पत्रों के आधार पर चुनाव आयोग मत -पत्रों का प्रकाशन करता है .इसमें  प्रत्याशियों के नाम उनके चुनाव-चिन्ह सहित मुद्रित किये जाते हैं .वर्तमान में भारत में अधिकांश चुनाव चूंकि ई.वी.एम्. द्वारा सम्पादित हो रहे  हैं इसलिए चुनाव-आयोग ई.वी.एम्. पर ये सब कार्य प्रदर्शित करता है .
9 -मतदान-केंद्रों की स्थापना- चुनाव-आयोग सम्पूर्ण निर्वाचन क्षेत्र में जनता की सुविधा को ध्यान में रखकर स्थान-स्थान पर विभिन्न मतदान-केंद्रों की स्थापना करता है .
10 -मतदान- निश्चित तिथि को मतदान होता है .जो विभिन्न चरणों में विभक्त किया जाता है .यदि ई.वी.एम्. पर मतदान किया जाता है तो इच्छित  चुनाव-चिन्ह के सामने वाला बटन दबाकर अपना मत दिया जाता है और यदि मत-पत्र द्वारा मतदान किया जाता है तब मत -पत्र पर इच्छित प्रत्याशी के नाम-व् चुनाव चिन्ह के सामने मुहर लगाकर मत-पत्र मतपेटी में डाल  दिया जाता है .
11 -मतगणना  -मतदान के बाद चुनाव-अधिकारियों के संरक्षण में मत-पत्रों अथवा ई.वी.एम्. पर मतों की गणना की जाती है .जो प्रत्याशी सर्वाधिक मत प्राप्त करता है ,उसे विजयी घोषित किया जाता है .5
* राजनीतिक दल-  लोकतान्त्रिक शासन -व्यवस्था में भिन्न-भिन्न सिद्धांतों व् राजनीतिक विचारधारा के आधार पर राष्ट्र-हित में संगठित समूह को  राजनीतिक दल कहते  हैं .प्रो.मुनरो का कथन है कि-''स्वतंत्र राजनीतिक दल ही प्रजातान्त्रिक सरकार का दूसरा नाम है  .''
* विरोधी दल-  सार्वजनिक निर्वाचन  में जो  राजनीतिक दल व्यवस्थापिका में बहुमत प्राप्त करने में असफल रह जाते हैं तथा सरकार में सम्मिलित नहीं होते हैं  ,उन्हें विरोधी -दल की संज्ञा दी जाती है .
*चुनाव घोषणा -पत्र - प्रत्येक  राजनीतिक दल एक चुनाव घोषणा पत्र जारी करता है , जिसमे वह  अपने उद्देश्यों ,नीतियों ,कार्यक्रमों और उपलब्धियों से सामान्य जनता को अवगत कराता  है और जनमत प्राप्त करने का प्रयत्न करता है . चुनाव घोषणा-पत्र राजनीतिक दल के महासचिव अथवा अध्यक्ष द्वारा जारी किया जाता है .
     उपर्युक्त के अतिरिक्त प्रत्याशी,उम्मीदवार ,मुख्यमंत्री  ,प्रधानमंत्री  ,केंद्रीय-सरकार ,राज्य-सरकार, राज्य-विधान मंडल ,संसद, लोक-सभा, राज्य-सभा , विधान-सभा , विधान-परिषद् ,सांसद , विधयक ,चुनाव-परिणाम , बहुमत ,अल्पमत ,गठबंधन ,निर्दलीय आदि हज़ारों शब्द आज भारतीय चुनाव के परिप्रेक्ष्य में अत्यधिक प्रचलन में हैं .निश्चित रूप से चुनावों के माध्यम से हिंदी भाषा की शब्दावली में अनेक नए शब्द जुड़े  व् प्रचलित हुए हैं .

आ-चुनाव और हिंदी का  बढ़ता  शब्द भण्डार  -

यह तो सर्वज्ञात ही है कि  '  भाषा विचार-विनिमय का साधन है. भावों और विचारों की सपाट बयानी के लिए विश्व की प्रत्येक गतिशील  भाषा अन्यान्य भाषाओँ से सुविधानुसार शब्द-समूह ग्रहण करती है .6
शब्द समूह से तात्पर्य ऐसी शक्ति  से होता है ; जो किसी भाषा को समृद्ध बनाता है . हिंदी का शब्द-समूह बहुत विशाल एवं संपन्न है .हिंदी के आधुनिक रूप के विकास में जहाँ अपभ्रंश का महत्वपूर्ण स्थान है ,वही हिंदी को एक विस्तृत संपत्ति प्रदान करने का श्रेय संस्कृत भाषा और साहित्य को जाता है .इसी प्रकार भारत की राजनैतिक परिस्थितियों के उथल -पुथल के युग ने मध्यकाल में जहाँ मुस्लिम -शासकों की सत्ता  के कारण अरबी -फ़ारसी के शब्दों से हिंदी-शब्द-समूह को समृद्ध कराया , वही आधुनिक काल में पुर्तगाली ,फ्रांसीसी  ,डच ,अंग्रेजी शासन के कारण विदेशी भाषाओँ के हज़ारों शब्द हिंदी में आ मिले .
चुनावी  हिंदी के शब्द-समूह में भी संस्कृत , अरबी-फ़ारसी के शब्दों के बाहुल्य के साथ-साथ अंग्रेजी के शब्दों का बहुत प्रयोग किया जा रहा .चुनावी हिंदी  के प्रमुख रूपों में एक तो हिंदुस्तानी रूप है ;जिसमे अरबी-फ़ारसी के शब्दों का प्रयोग अधिक किया जाता है और दूसरा रूप जिसमे परिनिष्ठित खड़ी बोली का प्रयोग अधिक  किया जाता है ,इसमें संस्कृत से सीधे हिंदी में आये [तत्सम ] शब्दों का प्रयोग किया जाता है . साथ ही वर्तमान में चुनावी हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों का बढ़ता प्रयोग एक नयी भाषायी समीकरण -हिंदी-+इंग्लिश =हिंग्लिश की ओर संकेत कर रहा है .
चुनावी -हिंदी में प्रयुक्त होने वाले हिंदी के शब्द-समूह का वर्गीकरण दो भागों में किया जा सकता है -
क- भारतीय भाषाओँ के शब्द - चुनावी हिंदी के शब्द -भंडार को सर्वाधिक समृद्ध आर्य-भाषाओँ के शब्दों ने ही बनाया है क्योंकि ये ही हिंदी भाषा की मातृ-समान संरक्षिका भाषा हैं .
भारतीय आर्य भाषाओँ में संस्कृत से मूल  रूप में हिंदी में आये शब्दों का योगदान चुनावी हिंदी में अत्यधिक महत्वपूर्ण है .इन्हें तत्सम शब्द कहा जाता है . ''किसी भाषा के वे शब्द जो मूल रूप में ही दूसरी भाषाओँ  द्वारा ग्रहण कर लिए जाते हैं ,तत्सम कहलाते हैं .हिंदी में संस्कृत भाषा से मूल रूप में जो शब्द आये ,उन्हें तत्सम शब्दों की संज्ञा दी गई है .'7
चुनावी हिंदी ,जो राजनैतिक दलों के प्रवक्ताओं ,प्रतिनिधियों  व् मीडिया द्वारा चुनावों के दौरान  प्रयुक्त की जाती है उसमे अनेक तत्सम शब्दों के बहुलता रहती है .उदाहरणार्थ -
* प्रभारी       *सभा   *बाहुबली -विधायक
*आयोग      *चिन्ह   *जन-सेवक
*प्रत्याशी          *अभियान   *जन-प्रतिनिधि
*प्रजा    *शासक   *रणनीति
* प्रचार     *आदर्श आचार संहिता
*प्रतिद्वंदी   *प्रचारक    *मत
*घोषणा-पत्र  *निरीक्षक  *जंगलराज
*मतदानाधिकार   *ध्रुवीकरण  *नेता *नेत्री
विधायक   *संसद   *सांसद   *संघर्ष  *बहुमत   *अल्पमत * खंडित-जनादेश
तत्सम शब्दों के साथ-साथ अर्ध-तत्सम ,तद्भव ,देशज ,संकर ,अनुकरणात्मक ,प्रतिध्वन्यात्मक आदि शब्द भी चुनावी हिंदी शब्द समूह में प्रयोग किये जाते हैं . देशज शब्दों के अन्तर्गत ऐसे शब्द आते हैं ''जो हिंदी में प्रचलित तो हैं  किन्तु उनकी व्युत्पत्ति  का कुछ पता नहीं चलता और देशी बोलियों में मिलते हैं , वे देशज कहलाते हैं .'' चुनावी हिंदी में प्रयुक्त होने वाले शब्द - घपला , भोंपू  ,गड़बड़ ,वोटकटवा आदि ऐसे ही शब्द हैं .
चुनावी हिंदी में प्रतिध्वन्यात्मक शब्दों के दर्शन भी होते  हैं .प्रतिध्वन्यात्मक शब्दों से तात्पर्य है कि जिन शब्दों के प्रकार और सम्बन्ध का ज्ञान करने के लिए आंशिक आवृति कर दी जाये .यथा - चंदा-वंदा ,नेता-वेता आदि .
चुनावी हिंदी वर्तमान में जिस दिशा में जिस दिशा में बढ़ रही है ,उसके  सर्वाधिक  महत्वपूर्ण  बिंदु  हैं  -'संकर' शब्द . '' जो शब्द दो भाषाओँ के योग से बने हैं ,उन्हें 'संकर '  शब्द कहते  हैं .' 8  यथा -
* अमन-सभा  [अरबी+संस्कृत]
*काउन्सिल-निर्वाचन [अंग्रेजी+संस्कृत ]
*स्टार-प्रचारक [अंग्रेजी+संस्कृत]
*कांग्रेसी [अंग्रेजी+संस्कृत ]
*कांग्रेस-अध्यक्ष [अंग्रेजी+संस्कृत ]
*भारतीय जनता पार्टी [सं+सं+अंग्रेजी ]
*पैदल-मार्च [हिंदी+अंग्रेजी ]
*विधान-सभा -सीट [ सं+अंग्रेजी]
* सिटिंग -विधायक [अंग्रेजी+संस्कृत]
*पार्टी-अध्यक्ष [अंग्रेजी+संस्कृत ]
*पार्टी-उम्मीदवार {अंग्रेजी+फ़ारसी]
*पार्टी-प्रत्याशी[अंग्रेजी+संस्कृत ]
*माफिया-राज  [अंग्रेजी+हिंदी ]
चुनावी हिंदी में बंगाली, मराठी ,पंजाबी ,गुजरती आदि आधुनिक भारतीत्य आर्य-भाषाओँ के शब्द भी सम्मिलित हुए हैं .यथा -गुजरती से 'हड़ताल' , मराठी से 'चालू ' ,लागू' ,बंगला से 'भद्र्लोग ' इत्यादि .
भारतीय-आर्य भाषाओँ के अतिरिक्त चुनावी हिंदी में आर्येतर भाषाओँ के शब्दों प्रचलन भी प्रमुखता के साथ किया जाता है .अनार्य-भाषाओँ के शब्दों में तमिल, तेलुगू , मलयालम , कन्नड़ भाषाओँ के शब्द मुख्य रूप से प्रचलित हैं .यथा-कटु , कलुष , महिला , माला आदि .
द्रविड़ परिवार के अतिरिक्त आग्नेय व् मुंडा कुल की भाषाओँ के शब्द भी चुनावी हिंदी में प्रयुक्त किये जाते हैं .

ख-विदेशी भाषाओँ के शब्द -   चुनावी हिंदी में समय-समय पर वैश्विक स्तर पर हो रहे परिवर्तनों एवम भारतीय परिस्थितियों के कारण  अनेक विदेशी भाषाओँ  के शब्दों का प्रचलन बढ़ है .इन विदेशी शब्दों के स्रोतों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
१-मुस्लिम संपर्क से आये शब्द और चुनावी हिंदी - मुस्लिम नेताओं और गंगा-जमुना दोआब के आस-पास की जनता द्वारा  हिंदी भाषा के जिस रूप प्रयोग किया जाता है उसे हिंदुस्तानी की संज्ञा दी जाती है और चुनावों के दौरान  राजनैतिक दलों व् नेताओं द्वारा जनता से संवाद स्थापित करने में वे इसी का प्रयोग करते है .हिंदुस्तानी भाषा में उर्दू ,अरबी, फ़ारसी ,ईरानी ,पश्तो ,तुर्की आदि शब्दों का बाहुल्य  है .चुनावी हिंदी में मुस्लिम-संपर्क से आये  प्रमुख शब्द कुछ इस प्रकार हैं -
* ईरानी शब्द- क्षत्रप , तीर आदि .
*पश्तो शब्द- लुच्चा , अटकल ,गुंडा आदि
*तुर्की शब्द-  बाबा , काबू , कुर्ता , कैंची ,तुर्क आदि .
*अरबी-फ़ारसी शब्द - चुनावी हिंदी में मुस्लिम संपर्क से आये  अरबी-फ़ारसी भाषा के ही शब्द सर्वाधिक प्रयुक्त किये जाते हैं क्योंकि मध्यकाल में भारत में मुस्लिम शासकों का शासन रहा और उस समय की राजभाषा फ़ारसी ही थी ..चुनावी हिंदी में चूंकि जन-जन की बोलचाल की भाषा के प्रचलित शब्द ही प्रयुक्त होते हैं और अरबी-फ़ारसी के शब्द भारतियों की हिंदी भाषा में इस तरह घुल-मिल गए हैं कि वे हिंदी के ही लगते हैं .उदाहरणार्थ -
* सरकार [फ़ारसी]    *जंग [फ़ारसी]
*वादा [अरबी]      *मुद्दा [अरबी]
* उम्मीदवार [फ़ारसी]   *सियासत [अरबी ]
* सियासी [अरबी]  * बगावत [अरबी]
* बागी [अरबी]      *ऐलान [अरबी]

२-योरोपीय प्रभाव से आये शब्द और चुनावी हिंदी -चुनावी हिंदी में अनेक शब्द योरोपीय देशों से संपर्क के कारण भी प्रचलित हुए .इनमे पुर्तगाली , फ़्रांसिसी , अंग्रेजी शब्दों की बहुलता है .चुनावी-हिंदी में योरोपीय भाषाओँ में से सर्वाधिक शब्द अंग्रेजी के प्रयुक्त होते हैं .यथा -
*लीडर   *इलेक्शन     *रोड-शो
*सिम्बल   *पार्टी    *पब्लिक
*कैंडिडेट    *रिजल्ट   *स्पीच
*स्टेज    *इ.वी, एम्.    *बूथ
*बूथ-कैप्चरिंग   *कमेटी   *कांग्रेस
*पब्लिसिटी     *वर्कर   *वर्किंग -कमेटी
*सोशल-इंजीनियरिंग   *पार्टी-सुप्रीमो
*वोट    *वोटर      *वोट-बैंक
*मार्च   * गेम-चेंजर   * पॉलिटिकल-इंजीनियरिंग

उपर्युक्त वर्णित शब्द-समूहों के अतिरिक्त अनेक योरोपीय भाषाओँ के साथ-साथ अन्य महाद्वीपों के संपर्क में आने के कारन उनके शब्द भी हिंदी के चुनावी स्वरुप को समृद्ध कर  रहे  हैं  .इसप्रकार स्पष्ट है की चुनावी-हिंदी का शब्द-समूह निरंतर बढ़ रहा है और नित नवीन शब्द इसके शब्दकोष में जुड़ रहे हैं .

इ-चुनावी हिंदी और मुहावरे - '' मुहावरा शब्द हिंदी में उर्दू के संपर्क से आया है .उर्दू भाषा में यह   शब्द अरबी से गृहीत है और इसका तत्सम रूप है -मुहावर:, जिसका अर्थ है -बोलचाल या बातचीत .किसी भाषा की बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले वे शब्द-युग्म या वाक्यांश ;जो जन-भाषा का अंग बन गए हो और जिनका अर्थ शब्दार्थ या वाक्यार्थ से भिन्न और चमत्कारपूर्ण होता है ,मुहावरे कहलाते  हैं .........मुहावरों के प्रयोग से भाषा की व्यंजना -शक्ति में पंख लग जाते हैं .वंचित प्रयोजन को व्यक्त करने में इनसे वक्त को बड़ी सफलता मिलती है .'' 9
चुनाव के दौरान मीडिया व्  राजनैतिक दलों के प्रवक्ताओं , चुनाव-रैली में नेताओं-नेत्रियों  द्वारा प्रायः मुहावरेदार भाषा का प्रयोग किया जाता है .यथा-
* भाजपा के लिए  'नाक का सवाल ' बना मणिपुर चुनाव 10
* आपके फैसले पर टिकी पूरे देश की निगाहें .11
*बसपा-भाजपा के 'चक्रव्यूह में फंसे ' माताप्रसाद 12
*पांचवें दौर में सभी दलों के बीच 'कांटे की लड़ाई '13
*चौथा चरण:राजा भैया सहित दिग्गजों की 'प्रतिष्ठा दांव पर '14
*चुनावी चक्रव्यूह का छठ द्वार भेदने की रोचक जंग 15
* 'शायद इसलिए मोदी और शाह ने पूर्वांचल की दूसरी समस्याओं के साथ इस मुद्दे पर भी ' हमला बोलना ' जरूरी समझ  .16
* पूर्वांचल में बागी 'बने सिरदर्द '17
* ताल-ठोकना ,दामन थामना
न केवल हिंदी के प्रचलित मुहावरों का प्रयोग चुनावी हिंदी में किया जाता है वरन  चुनावी -हिंदी में कुछ नवीन मुहावरे भी सृजित हो रहे हैं -
*पार्टी का चेहरा होना -पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाला नेता .
*चुनावी -जंग होना - दो पार्टी के प्रत्याशियों के बीच चुनाव में विजय प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा .
*गठबंधन की राजनीति - कई राजनैतिक दलों द्वारा मिलकर सरकार बनाना .
*वोट-बैंक की राजनीति -किसी विशेष सम्प्रदाय को आकर्षित करना राजनैतिक दलों द्वारा चुनाव में .
*सत्ता पर काबिज होने का सपना देखना -चुनाव में बहुमत प्राप्त करने की अभिलाषा करना .
*चुनावी-वादे - ऐसे आश्वासन जिनके पूरे होने की आशा नहीं करनी चाहिए .
ये ही नहीं प्रमुख नेताओं द्वारा भाषणों में मुहावरों का भरपूर प्रयोग किया जाता है .यथा -
'' मझवां के चंदईपुर में शुक्रवार को सभा में [प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ]ने कहा कि खाट बिछाने वालों क़ी खाट तो लोग पहले ले गए , अब इनकी '' खटिया खड़ी करने क़ी '' बारी है .''18
इस प्रकार स्पष्ट है कि चुनावी भाषा का मुहावरेदार होना इसकी एक प्रमुख विशेषता है.
i-'प्रतीकों'' से प्रहार -  हिंदी साहित्य में ' प्रतीक' का सामान्य अर्थ है -संकेत -चिन्ह , जिसका प्रयोग किसी अन्य अर्थ के स्थान पर किया जाता है .दूसरे शब्दों में जब कोई प्रदार्थ किसी भाव या विचार का संकेत बन जाता है ,तो प्रतीक कहलाता है .........प्रतीक योजना का उद्देश्य साहित्य में प्रमुखतः कथ्य को आकर्षक रूप प्रदान करना होता है .''19
              चुनाव के दौरान चाहे नेता-नेत्रियां हो अथवा मीडिया -सभी अपने कथ्य को आकर्षक व्   जन-जन तक अपनी बात मजबूती के साथ पहुँचाने के लिए 'प्रतीकों' के माध्यम से विपक्षियों पर प्रहार करते हैं ,साथ ही इनकी एक और मंशा यह भी होती है कि  प्रतीकों के माध्यम से विपक्षियों को कटु-भड़काने वाले  वचन भी कह दिए जाये और ये निर्वाचन आयोग की आचार संहिता से भी बचे रहें . उदाहरणार्थ -
*भगवा पार्टी - भारतीय जनता पार्टी के लिए विपक्षियों द्वारा ये प्रतीक प्रयोग किया किया जाता है .
*बहन जी - बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्षा सुश्री मायावती जी के लिए बहन जी शब्द का प्रयोग किया जाता जाता है .
*बाहुबली- आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं के लिए बाहुबली शब्द का प्रयोग किया जाता है .
*पप्पू - सोशल साइट्स पर विरोधियों द्वारा  पप्पू प्रतीक बनाया गया है कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष  श्री राहुल गाँधी की राजनीतिक अपरिपक्वता का .
*फेंकू - विपक्षियों द्वारा सोशल साइट पर लोक-सभा चुनाव 2014  के दौरान श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किये जाने वाले चुनावी-वादों को लेकर उनके लिए यह प्रतीक प्रयोग किया गया .
       उपर्युक्त के अतिरिक्त राजनैतिक दल को निर्वाचन आयोग द्वारा जो चुनाव-चिन्ह आवंटित किये जाते हैं वे भी उनके प्रतीक बन जाते हैं -जैसे कांग्रेस पार्टी का चुनाव-चिन्ह 'हाथ' व् भारतीय जनता पार्टी का 'कमल का फूल '' चुनाव-चिन्ह हैं .
*चुनावी-हिंदी व् नारे- 'नारों से तात्पर्य ऐसी पनकी अथवा शब्द-समुच्चय से होती है जो किसी व्यक्ति, वस्तु , कंपनी , राजनैतिक दल , के समर्थकों द्वारा स्व-हित मेंउच्चरित किये जाते हैं अथवा पोस्टरों ,विज्ञापनों व् सोशल-साइट्स पर प्रदर्शित किये जाते हैं .
       लोकतंत्र में जितना महत्त्व चुनाव का है ,चुनाव में उतना ही महत्त्व 'नारों ' का होता है .एक सार्थक नैरा पूरे चुनाव का रूख ही पलट देता है .चुनाव-प्रचार के महत्वप[ऊर्ण अंश जिन्होंने भारतीय-राजनीती को दिशा प्रदान की कुछ इस प्रकार हैं -
* 'जनसंघ को वोट दो ,बीड़ी पीना छोड़ दो ,बीड़ी में तम्बाकू है ,कांग्रेस वाला डाकू है ''-[1967  चुनाव]
*ये देखो इंदिरा का खेल ,खा गयी शक्कर ,पी गयी तेल [जनसंघ चुनाव प्रचार ]
*गरीबी हटाओ ,इंदिरा लाओ ,देश बचाओ [1971  चुनाव प्रचार कांग्रेस ]
*''जब तक सूरज-चाँद रहेगा ,इंदिरा तेरा नाम रहेगा ''[1984  चुनाव ]
*हर हर मोदी ,घर घर मोदी [लोकसभा चुनाव 2014 ]
*यूं.पी को ये साथ पसंद है [विधानसभा चुनाव २०१७उत्तर प्रदेश ]
*सबका साथ -सबका विकास [भारतीय जनता पार्टी ]
         
*चुनावी हिंदी और गद्य-पद्य विधाओं का रूप -चुनाव के दौरान जहाँ मौखिक रूप में भाषण ,नारों आदि के माध्यम से प्रचार किया जाता है वही राजनैतिक दल जनता को आकर्षित करने के लिए हिंदी की गीत विधा का भी भरपूर प्रयोग करते हैं .चुनावी गीत टेलीविजन ,वेबसाइट्स के साथ-साथ गली-गली में लाउडस्पीकर पर बजाये जाते हैं .गीतों  में चुनावी मुद्दों का प्रचार व् विपक्षियों की भर्त्सना की जाती है .कई बार ये फ़िल्मी गानों की धुन पर तैयार किये जाते हैं और कई बार हिंदी के लोक गीतों की धुन पर इन्हें तैयार किया जाता है .सन 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का प्रचार गीत -अच्छे दिन आने वाले हैं '' अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था .गीत के अतिरिक्त चुनाव से सम्बंधित [हिंदी पद्य की विधाओं में] छंद जैसे -दोहा ,कुंडलिनी ,पद आदि समाचार-पत्रों में प्रकाशित होते हैं ,जिनके माध्यम से रचनाकार या तो किसी पार्टी विशेष का समर्थन करता  है अथवा जनता को जागरूक  करने का प्रयास करता है .अमर-उजाला दैनिक ने विधान-सभा चुनाव २०१७ के दौरान एक पूरा पृष्ठ 'महासंग्राम'' नाम से चुनाव की रिपोर्टिंग को ही समर्पित किया हुआ था .उस पृष्ठ पर ''सनद रहे '' कॉलम के अन्तर्गत हिंदी के चुनावी -छंद लेखन को प्रोत्साहित करते हुए नित्य छंद प्रकाशित किये जाते रहे .उदाहरणार्थ -बनज कुमार बनज का दोहा -
'' लोकतंत्र जीवित रखो , दो जाकर के वोट
ऐसा लेना फैसला ,ना हो जिसमे खोट !'' 20
    हिंदी गद्य की विधाओं में चुनावी हिंदी के अन्तर्गत रिपोर्टिंग ,यात्रा-वृतांत , महान नेताओं की जीवनी व् आत्मकथा , समाचार-पात्र,पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख आदि महत्वपूर्ण रूप से इसके स्वरुप को निखार रहे हैं .

*चुनावी-हिंदी की अन्य विशिष्टताएं -
१- चुनावी हिंदी में अभिधा शब्द-शक्ति के स्थान पर लक्षणा व् व्यंजना का भरपूर प्रयोग किया जाता है .यथा-
''जनता ने बिछाया ऐसा तार ,सपा-बसपा और कांग्रेस को लगेगा करंट :मोदी ''21
 यहाँ तार बिछाने व् करंट लगाने से तात्पर्य यह है की जनता इस चुनाव में सपा-बसपा को वोट न देकर बीजेपी को वोट करेगी .
२-प्रसिद्द हिंदी-उर्दू के कवियों -शायरों की पंक्तियों का प्रयोग कर भाषा को अलंकारमय बनाया जाता है .यथा -
* कवि अशोक चक्रधर के हवाले से कहा कि किसी भी काम को कराने के लिए नज़राना , शुकराना , हक़राना  ,ज़बरन पेश करना होता है .इससे मुक्ति का एक ही उपाय है इनको -''हराना' :मोदी '22
*''मैं हिंदी और उर्दू का दोआब हूँ ,
  मैं वो आइना हूँ जिसमे हम और आप हैं'' :राहुल गाँधी '२३
३-शब्द-संक्षेपण व् विस्तारण -चुनावी हिंदी में दोनों ही प्रवर्तियाँ परिलक्षित हो रही हैं .शब्द-संक्षेपण के अन्तर्गत कई शब्दों के प्रारंभिक अक्षर को लेकर एक नया ही शब्द बना दिया जाता है .यथा -
*भारतीय जनता पार्टी -बीजेपी
*बहुजन समाज पार्टी- बसपा
*समाजवादी पार्टी -सपा
*राष्ट्रीय लोकदल-रालोद
* नरेन्द्र मोदी- नमो
     चुनावी हिंदी में शब्द-विस्तारण के अन्तर्गत किसी एक शब्द को लेकर उसकी नयी ही व्याख्या प्रस्तुत की जाती है .इसके अन्तर्गत अंग्रेजी शब्दों की हिंदी व्याख्या ज्यादा प्रचलन में है. यथा -उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में SCAM अंग्रेजी के  शब्द का विस्तारण  मोदी जी व् राहुल जी द्वारा चुनावी रैलियों में भिन्न-भिन्न किया गया ,वही मोदी जी ने बसपा शब्द -संक्षेप का विस्तारण कुछ और ही कर दिया .यथा-बहन जी की संपत्ति पार्टी .24
*चुनावी हिंदी में दिए जाने वाले भाषणों की शैली मुख्यतः व्यंग्यात्मक ,उद्बोधनात्मक ,आलंकारिक ,सरस होती है .व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग अधिकांश मंझें हुए नेताओं द्वारा किया जाता है .वर्तमान में श्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों में इस शैली के दर्शन सर्वाधिक होते हैं .यथा -''लोग अच्छा काम करते हुए गायत्री मन्त्र बोलते हैं ,लेकिन सपा-कांग्रेस वाले गायत्री प्रजापति मन्त्र बोल रहे हैं .''25[यहाँ पर एक बलात्कार के आरोपी विधायक  का साथ देने का आरोप लगाते हुए पैना व्यग्य किया गया है सपा-कांग्रेस पर ]
*चुनावी हिंदी में अंग्रेजी का बोलबाला- चुनावी हिंदी के स्वरुप के सम्बन्ध में सर्वाधिक चिंतनीय विषय यह है कि वर्तमान में इसमें अंग्रेजी के शब्दों का प्रचलन बढ़ रहा है .अधिकांश नेता युवा पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं .मीडिया भी इसी भेड़चाल का शिकार हो रहा है .हाल ही में संपन्न विधानसभ चुनाव 2017में भी नेताओं ने पलटवार करने में अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी की तुलना में ज्यादा तरजीह दी .यथा -
*'मायावती का पलटवार ,बोली नरेन्द्र मोदी का मतलब-निगेटिव दलित मैन''26
*''हार्वर्ड पर भरी हार्डवर्क :मोदी '27
*चुनावी हिंदी में अपशब्दों का बढ़ता प्रयोग - '' भारतीय राजनीति की भाषा में ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गयी .....राजनीति से व्यंग्य गायब है ,हंसी गायब है ,परिहास गायब है ...उनकी जगह गालियों और कटु वचनों ने ले ली है .''28
  वास्तव में आज न किसी को अपने पद का लिहाज रह गया है ,न आयु का .तब भाषा की मर्यादा को कौन बचाये ? चुनावी हिंदी के गिरते हुए स्तर के प्रमाण हर चुनाव में सबके सामने आ ही जाते हैं .यथा -
* अखिलेश बोले-अब तो गुजरात के गधों के विज्ञापन आने लगे हैं .''29
* पी.एम्. को अपशब्द कहने पर लालू के खिलाफ परिवाद-''आरोप है कि जौनपुर सदर विधानसभा क्षेत्र के गभीरं बाजार में २८ फरवरी २०१७ को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में आयोजित सभा में भाषण के दौरान पी.एम्. नरेन्द्र मोदी की तुलना हिजड़े से करते हुए हिजड़ा जैसा शब्द से संबोधित किया .''
         चुनावी हिंदी की इस विद्रूपता पर विचार व्यक्त करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञानं विभाग के पूर्व -अध्यक्ष डॉ.एस.के.द्वेदी का कहना सटीक ही है -''सियासी दलों का मन्तव्य कुछ भी हो ,उन्हें भाषा का स्तर बनाये रखना चाहिए .स्तरहीन भाषा जनतांत्रिक परिपक्वता का संकेत नहीं है .संसद के भीतर और बहार जिस तरह आचरण होने लगा है ,उस पर सभी को विचार करना चाहिए .सभी को भाषा की मर्यादा बनाये रखनी चाहिए . ''30

निष्कर्ष- उपर्युक्त समस्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि साढ़े दशकों से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया  चुनावों का अंग होते हुए जहाँ भाषा की दृष्टि से हिंदी के शब्द समूह में नए-नए शब्द जुड़े हैं वही जिन्होंने हिंदी का एक नया ही स्वरुप ''चुनावी हिंदी '' सृजित कर दिया है वही अंग्रेजी शब्दों के अधिक प्रयोग के कारन चुनावी हिंदी ''हिंग्लिश'' होने की ओर अग्रसर है .भारतीय जनता ,नेताओं ,हिंदी मीडिया को इस ओर विशेष ध्यानाकर्षण करने की आवश्यकता है .चुनावी हिंदी में अपशब्दों का बढ़ता प्रयोग भी इसके स्वरुप को विकृत कर रहा है .अतः इन पर सख्त पाबन्दी लगाई जानी चाहिए .नवीन उपमेय ,उपमान ,प्रतीकों के प्रयोग द्वारा चुनावी हिंदी हिंदी साहित्य के प्रयोगवादी काल का स्मरण कराती है . समय व् प्रयोजन से भाषा का स्वरुप परिवर्तित होता आया है और ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है .चुनावी हिंदी ने हिंदी भाषा को सामयिक महत्ता प्रदान करने में जो योगदान दिया है ,निश्चय ही सराहनीय है .

                         सन्दर्भ -सूची

संदर्भ-स्रोत       सन्दर्भ -संख्या        पृष्ठ-संख्या
................................................................
*प्रजातंत्र में             1                        211
जन-जीवन ,            3                       216
चित्रा हाईस्कूल         4                       213
सामाजिक विज्ञानं    5                        212
*भाषा-विज्ञानं           2                        262    
हिंदी-भाषा :
हिंदी के विविध
रूप ,पूजा साहित्य
सीरीज ,सरन
प्रकाशन मंदिर
पीयूष बी.ए.हिंदी      6                     64
दिग्दर्शन                 7                      66
                            8                      66-67
*हिंदी-भाषा              9                     79
डॉ,नारायण
स्वरुप शर्मा,
संस्करण 1990                                              
*उपकार-प्रकाशन      19                 203T
UGC /नेट/JRF /
सेट/हिंदी                                                    
* अमर-उजाला   10,11,12,13,14, [23 FEB.
हिंदी दैनिक ,         20,30                  2017]
मेरठ                    15,16,             [ 28FEB .
संस्करण                                      2017]
                        18,21,22,23,     [4मार्च
                                                  2017]
                          24,27,29           [21FEB
                                                   २०१७]
                          25                     [5मार्च
                                                   २०१७]
                           27                       [2मार्च  
                                                  2017]
*कलम करेगी      28                  [8मार्च
धमाका                                      2017]
समाचार-पत्र

                       

1 टिप्पणी:

Shalini Kaushik ने कहा…

सार्थक शोध प्रस्तुति