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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

कुम्भकर्णी नींद से जागो -समाज-प्रशासन (तेजाबी हमला-शामली[कांधला] )

 

तेजाबी  हमलों  की  शिकार  बहनों का दर्द मात्र इतना नहीं कि वे तेजाबी हमलें का शिकार बनी .उनका दर्द मृत सामाजिक संवेदनाएं भी हैं .जब उन पर हमला किया गया वे एक कॉलेज की परीक्षा में ड्यूटी देकर घर लौट रही थी .दिन का समय था .वे तेजाब फैकने वालों से भिड़ी भी पर वे मार-पीट कर भागने में सफल रहे .वे सड़क पर पानी के लिए तड़पती रही और स्वयं रिक्शा कर अस्पताल गयी .आस पास के लोंगों  ने  कोई  मदद  नहीं की .यदि समाज की संवेदनाएं इतनी मृत नहीं होती तो शायद ऐसी घटना घटती ही नहीं .
    तेजाबी घटना की शिकार तीन  बहनों ने मीडिया के सामने अपने दुःख को प्रकट करते हुए कहा कि -''कोई हमारा साथ नहीं दे रहा है '' कडवी सच्चाई यही है हमारे समाज की कि लड़कियों पर- ताने कसे जाते हैं ,उनके साथ छेड़खानी की जाती है और जब इस सब से काम नहीं बनता तो तेजाबी हमले कर उन्हें सबक सिखाया जाता है और समाज मूक दर्शक बनकर सब कुछ देखता रहता है .
         आज अगर किशोर व् युवा तेजाबी इरादे लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं तो उसके लिए उनके परिवार वाले भी कम जिम्मेदार   नहीं है जो  ये  नहीं देखते  कि उनके नौनिहाल   किसकी   जिंदगी  बर्बाद  करते घूम रहे हैं .पूरा प्रशासन  भी सुप्त अवस्था में रहता है .एक बाइक  पर चार-से पांच लफंगें हूँ-हा-हा का शोर मचाते दिन भर सड़कों पर घूमते  रहते हैं   और उन पर किसी कि पाबन्दी नहीं -न घरवालों की और न प्रशासन की .लड़कियों के स्कूल-कॉलेज की छुट्टी का समय हो अथवा ट्यूशन पर जाने-लौटने  का समय , महिला शिक्षिकाओं के आने-जाने का समय चौराहों-गलियों में लफंगों की भीड़ इकट्ठा रहती है .न समाज इस ओर ध्यान दे रहा और न प्रशासन .
    इस एक तेजाबी घटना ने यदि समाज व् प्रशासन को कुम्भकर्णी  नींद से नहीं जगाया तो आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं के  फिर से  होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता .

     शिखा कौशिक 'नूतन'

1 टिप्पणी:

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

यही उदासीनता सबसे घातक है-कि हम ठीक हैं, हमें क्या करना.समय रहते सावधान हो कर समुचित उपाय करने में ही अक्लमंदी है !