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शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

 रामायण में निर्देशित   बलात्कार के लिए दंड -एक विश्लेषण


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दिल्ली में हुए गैंगरेप  की शिकार युवती के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे भारतीय समाज को झंकझोर डाला है .आरोपियों पर सख्त से सख्त व् शीघ्र अति शीघ्र सजा की मांग को लेकर जनता का सैलाब सड़कों पर उतर आया है .अधिकांश जनसमूह इन अपराधियों को फांसी की सजा दिए जाने के पक्ष में है तो कानूनविदों की राय है कि भारतीय कानून के अनुसार इन्हें केवल उम्रकैद कीसजा  दी जा सकती है .किसी का मत है कि इन्हें हाथी के पैरों   टेल कुचलवा दिया जाये तो कुछ की मांग है कि इन्हें सीधे आग के हवाले कर दिया जाये .कुछ का मत है कि इनके अंग भंग कर इन्हें नपुंसक बना दिया जाये .विगत चालीस वर्षों में महिला विरूद्ध अपराधों में जिस तरह आठ सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है [नवम्बर २०११ में एन.सी.आर.बी.द्वारा प्रकाशित आंकड़े ]  उसके परिपेक्ष्य में मानव समाज के माथे पर कलंक स्वरुप इस अपराध 'बलात्कार' के लिए कड़ी  सजा निर्धारित  करने  का समय  आ गया  है .इसी संदर्भ में हमें हमारे शीर्ष मार्गदर्शक धार्मिक ग्रन्थ ''श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण '' में उल्लिखित इस घिनोने अपराध 'बलात्कार' हेतु दण्डित किये गए पापाचारी पुरुषों से सम्बद्ध प्रसंगों पर विचार करना आवश्यक  ही नहीं समयोचित भी है क्योंकि ''रामायण '' पग पग पर हर भारतीय मनुज को उचित आचरण हेतु निर्देशित करती है .
                                   नारी की मान -मर्यादा को रौदने वाले इस दुष्कर्म का सूत्रपात करने का श्रेय देवराज इंद्र को जाता है .महामुनि गौतम की भार्या देवी अहल्या के रूप-सौन्दर्य पर आसक्त होकर काम के वशीभूत इंद्र ने महामुनि गौतम का छद्म रूप धरकर देवी अहल्या से बलात्कार किया .इस दुष्कर्म के परिणामस्वरूप  इंद्र को जो दंड  दिया गया उसका उल्लेख   ''श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण'' में इस प्रकार वर्णित है -
[''मम रूपं समास्थाय ....तत्क्षनात''   (श्लोक-२७,२८ ,बालकाण्डे  अष्टचत्वारिंश :  सर्ग: पृष्ठ १२६ ) ]
''अर्थात दुर्मते तूने मेरा रूप धारण कर यह न करने योग्य पापकर्म किया है ,इस लिए तू विफल (अन्डकोशों से रहित ) हो जायेगा .रोष में भरे महात्मा गौतम के ऐसा कहते ही देवराज इंद्र के दोनों अंडकोष उसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़े ]
                 इसके अतिरिक्त 'उत्तर कांड  ' के ' विंश:सर्ग: 'में भी रावण पुत्र मेघनाद [ जो देवराज इंद्र को कैद कर इन्द्रजीत कहलाया ]के  द्वारा कैद कर लिए जाने पर ब्रह्मा  जी मेघनाद को वरदान देकर इंद्र को उसकी कैद से मुक्त कराकर पराजय व् देवोचित तेज़ नष्ट हो जाने से दुखी इंद्र से कहते हैं -
''तम तू दृष्टा... .... ...सुदुष्क्रतम ''[श्लोक-१८ पृष्ठ   -६८९] अर्थात -भगवान ब्रह्मा जी ने उनकी इस अवस्था को लक्ष्य किया और कहा -शतक्रतो !यदि आज तुम्हे इस अपमान से शोक और दुःख हो रहा है तो बताओ पूर्वकाल में तुमने बड़ा भारी दुष्कर्म क्यों किया था ?'
''सा ........., .......तदाब्रवीत '' [३० से ३५ श्लोक ,पृष्ठ -६८२ ]-इंद्र !तुमने कुपित और काम पीड़ित  होकर उसके [अहल्या] के साथ बलात्कार किया .उस समय उन महर्षि ने अपने आश्रम में तुम्हे देख लिया ''
'देवेन्द्र  !इससे  उन परम तेज़स्वी महर्षि को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तुम्हे शाप दे दिया .उसी शाप के कारण तुमको इस विपरीत दशा में आना पड़ा -शत्रु का बंदी बनना पड़ा .''
 'उन्होंने शाप देते हुए कहा -'वासव !शक्र !तुमने निर्भय होकर मेरी पत्नी के साथ बलात्कार किया है ,इसीलिए तुम युद्ध में जाकर शत्रु के हाथ में पड़ जाओगे .''
 'दुर्बुद्धे !तुम जैसे राजा के दोष से मनुष्य लोक में भी यह जार भाव   प्रचलित हो जायेगा ,जिसका तुमने यहाँ सूत्रपात किया है .इसमें संशय नहीं है .''
'जो जारभाव से पापाचार करेगा ,उस पुरुष पर उस पाप का आधा  भाग  पड़ेगा और आधा  भाग  तुम पर पड़ेगा   क्योंकि  इसके  प्रवर्तक  तुम्ही  हो .निसंदेह  तुम्हारा  यह स्थान  स्थिर  नहीं होगा  ''
                   वर्णित प्रसंग में उल्लिखित तथ्य इस और संकेत करते हैं कि-उस समय बलात्कारी को नपुंसक बनाना   व् उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा  से उसे विलग कर देना बलात्कार के दंड निर्धारित किये गए थे .
                                      ''उत्तर कांड ''के 'अशीतितम:सर्ग ' में राजा दण्ड द्वारा भार्गव कन्या अरजा के साथ बलात्कार का प्रसंग भी विचारणीय है .गुरु पुत्री द्वारा बार बार सचेत किये जाने पर भी काम के अधीन दण्ड ने बलपूर्वक स्वेच्छाचारवश   अरजा के साथ समागम किया .दंड द्वारा किये गए इस अत्यंत दारुण व् महाभयंकर अनर्थ पर देवर्षि शुक्र तीनों लोकों को दग्ध करते हुए कहते हैं -
[पश्यध्वं....... ....भविष्यति ' -श्लोक ४ से १० पृष्ठ -७८४ ]'अर्थात -देखो शास्त्रविपरीत आचरण करने वाले अज्ञानी राजा दण्ड को कुपित हुए मेरी ओर से अग्नि-शिखा के समान कैसे घोर विपत्ति प्राप्त होती है ' 
'पापकर्म का आचरण करने वाला वह दुर्बुद्धि नरेश सात रात के भीतर ही पुत्र ,सेना और सवारियों सहित नष्ट हो जायेगा .'''खोटे विचारवाले इस राजा के राज्य को सब ओर से सौ योजन लम्बा-चौड़ा है ,देवराज इंद्र ,भारी धूल की वर्षा करके नष्ट कर देंगे .''खोटे विचारवाले इस राजा के राज्य को सब ओर से सौ योजन लम्बा-चौड़ा है ,देवराज इंद्र ,भारी धूल की वर्षा करके नष्ट कर देंगे .''यहाँ जो सब प्रकार के स्थावर-जंगम जीव निवास करते हैं ,इस धूल की भारी वर्षा से सब ओर से विलीन हो जायेंगे  'जहाँ तक दण्ड का राज्य है वहां तक के समस्त चराचर प्राणी सात रात तक केवल धूलि की वर्षा पाकर अद्रश्य हो जायेंगे .'
[इत्युक्त्वा .....ब्रह्मवादिना ,श्लोक-१७,१८ ]'ऐसा कहकर शुक्र ने दूसरे राज्य में जाकर निवास किया तथा उन ब्रह्मवादी के कथनानुसार राजा दण्ड का वह राज्य सेवक,सेना और सवारियों सहित सात दिन में भस्म हो गया .''
                                            स्पष्ट है कि उस काल में बलात्कार को सर्वोच्च धर्मविरुद्ध आचरण मानते हुए ब्रह्म ऋषि   ने राजा दण्ड व् उसके देशवासियों को शाप की आग में जला डाला .राजा दण्ड को अपने इस पापाचार के कारण अपना समस्त वैभव -राज्य गवाना पड़ा .इस दण्ड को यदि वर्तमान परिपेक्ष्य में लागू किया जाये तो बलात्कारी के साथ उसके परिवारीजन को भी दण्डित किया जाना चाहिए और उसकी समस्त संपत्ति सरकार द्वारा जब्त कर ली जानी चाहिए .
                      'बलात्कारी शिरोमणि ' रावण का उल्लेख यहाँ न किया जाये यह तो संभव ही नहीं ..ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती जहाँ रावण द्वारा तिरस्कृत  किये  जाने पर प्रज्वलित अग्नि में समां गयी वही रावण द्वारा अपह्रत हुई देवताओं,नागों,राक्षसों.  असुरों ,मनुष्यों ,यक्षों और दानवों की कन्यायें व् स्त्रियाँ भय से त्रस्त एवं विह्वल हो उठी थी .ऐसे पापाचारी रावण द्वारा जब 'रम्भा'पर बलात्कार किया जाता है तब नलकूबर उसे भयंकर शाप देते हुए कहते हैं -
 'अकामा.....तदा ''  -श्लोक-५४,५५,५६ ,उत्तर कांड   षड्विंश : पृष्ठ -६७१]अर्थात -वे [नलकूबर ] बोले 'भद्रे  [रम्भा ] !तुम्हारी इच्छा न रहते हुए भी रावण ने तुम पर बल पूर्व्वक अत्याचार किया है .अत:वह आज से दूसरी किसी युवती से समागम नहीं कर सकेगा जो उसे चाहती न हो ' 
'यदि वह काम से पीड़ित होकर उसे न चाहने वाली युवती पर बलात्कार करेगा तो तत्काल उसके मस्तक के सात टुकड़े हो जायेंगे '' माता सीता के हरण का दुष्परिणाम तो रावण को अपने प्राण गवाकर ही भुगतना पड़ा था .
                     निश्चित रूप से यहाँ भी बलात्कारी को प्राणदंड की ही सजा दिए  जाने का निर्देश दिया गया है .

                           
                       'किष्किन्धा कांड 'के 'अष्टादश:'सर्ग में 'श्री राम 'स्वयं लोकाचार व् लोकविरुद्धआचरण हेतु पापी के वध को धर्मयुक्त ठहराते है . बाली द्वारा अपने वध पर रोष व्यक्त करने पर श्रीराम उसे उसके वध का कारण बताते हुए कहते हैं  -
[अस्य ........ ...पर्यवस्तिथ:-श्लोक १९,२४ ,पृष्ठ -६८८,८८९ ]''इस महामना सुग्रीव के जीते जी इसकी पत्नी रूमा का ,जो तुम्हारी पुत्रवधू के सामान है ,कामवश उपभोग करते हो ,अत: पापाचारी हो .वानर ! इस तरह तुम धर्म से भ्रष्ट हो स्व्च्छाचारी हो गए ............तुम्हारे इसी अपराध के कारण तुम्हे यह दंड दिया गया है .वानरराज जो लोकाचार से भ्रष्ट होकर लोकविरुद्ध आचरण करता है ,उसे रोकने या राह पर लेन के लिए मैं दंड के सिवा और कोई उपाय नहीं देखता .मैं उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूँ अथ मैं तुम्हारे पाप को क्षमा नहीं कर सकता जो पुरुष अपनी कन्या,बहिन अथवा .छोटे भाई की स्त्री के पास काम बुद्धि से जाता है ,उसका वध करना ही उसके लिए उपयुक्त दंड माना गया है ..........तुम धर्म से गिर गए हो ......हरीश्वर !हम लोग तो भरत की आज्ञा को ही प्रमाण मानकर धर्म मर्यादा   का उल्लंघन करने वाले तुम्हारे जैसे लोगों को दंड देने के लिए सदा उद्यत रहते हैं .''
                                                             स्पष्ट है कि हमारे मार्गदर्शक धार्मिक ग्रन्थ ''रामायण'' में बलात्कारियों के लिए नपुंसकता ,वध -जैसे कठोर दण्डों का विधान किया गया है .वर्तमान में बर्बरता कि सीमायें लाँघ चुके इस अपराध हेतु ऐसे ही कड़े दंड का प्रावधान शीघ्र किया जाना चाहिए .

[शोध ग्रन्थ-''श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण '' गीता प्रेस ,संवत-२०६३ इकतीसवां पुनर्मुद्रण ]

                                         डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन '

3 टिप्‍पणियां:

raj sha ने कहा…

विचारणीय ये है कि यहां उल्लेखित सारे शाप या दण्ड बलात्कार पीड़िता ने नहीं.. उस पुरूष ने दिये हैं जो उसे भोग रहा था या भोगने वाला था। क्या उस समय की ही तरह ही..आज की नारी भी उतनी ही अबला है कि पुरूष को शाप या दण्ड का निर्णय स्वयं ना कर सके? अन्य पुरूषों से ही अनुनय विनय या मॉंगे करती रहे... प्रदर्शन करती रहे।

Sunil Kumar ने कहा…

sarthak aur jankari se bhari post abhar ........

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

शुक्रिया आपकी सद्य टिप्पणियाँ हमारी अन्यतम धरोहर हैं .


अर्थात क्या राजा क्या प्रजा सब के लिए उस दौर में दंड बराबर था .अब से तीस चालीस साल पहले तक व्यक्ति अपराध तो कर लेता था लेकिन साथ ही अपराध भावना से ग्रस्त हो जाता था छिपाता

था

अपने अपराध को प्रायश्चित भी भीतर भीतर करता था अब ऐसा इरादतन मौज मस्ती षड्यंत्र के तहत किया जाता है इसीलिए सजा और भी कठोर और द्रुत होनी चाहिए .एक मानक का निर्धारण हो

जाए .उतनी सज़ा का हर कोई भागी बनाया जाए .